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क़यामत की रात, सुनहरा सवेरा

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  1969 फरवरी आज सोचता हूँ, कितना खुश था मैं, घर में एक छोटे भाई को पा कर। तब हम मीठापुर के दो कमरों के घर में हंसी खुशी चार प्राणी रहते थे - पापा, माँ और हम दो भाई। घर का नियम था - एक संडे छोड़ दूसरे संडे, वीणा या अशोक टॉकीज में सिनेमा जाना- जिस संडे सिनेमा नहीं जाना उस संडे, हार्डिंग्स पार्क जाना। बबलू के रहने से रौनक आ गई थी। तीन साल की उम्र हो चली थी। उस समय धर्मेन्द्र माला सिन्हा की फिल्म आंखे का गाना " दे दाता के नाम, तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे" बहुत चला हुआ था। हम सभी कंकरबाग ( उस समय 900 बीघे के नाम से जाना जाता था), अपनी मौसी के घर गए थे। उनका घर अभी बन रहा था। हम बच्चों को घर के बाहर बालू के टीले पर मजा आता था। हम बालू के किले बनाते, किले तक के रास्तों को अपनी चप्पलों से समतल करते। पास की तलैयों के साफ पानी में रंग बिरंगी छोटी मछलियाँ मिलती थीं। उस दिन हम सभी, मैं, बबलू, मेरी मौसेरी बहन मनी, घंटों बालू और पानी में खेलते रहे। बबलू खुश था -- आँखें का गाना गा रहा था - दे दाता के नाम, तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे" उस शाम हम सभी शाम का खाना खा कर कंकरबाग ...