जंजीरें
विवाह के समय, पैरों में बिछिया पहनाते समय, चाची ने कहा था, बन्नी इसे कभी मत निकालना। नए जीवन की पहली जंजीर, मैंने खुशी खुशी स्वीकार की। आगे की जंजीरें मैंने खुद बुनी। मेरे सपने बुनते गए, मेरा घर बनता गया, पति के प्यार से, बच्चों की किलकारी से मैं सबकी हो कर रह गई मेरा स्वत्व विलीन हो गया। सबकी पसंद का ख्याल, उनकी सेहत की चिंता घर चलाने की जद्दोजहद इन सब में मैं कहाँ रही। उस दिन बेटी ने कहा मम्मी तुम तो मकड़ी हो गई अपने जाले में उलझ गई मुझे नहीं उलझना है। मुझे तो उड़ना है। आकाश नापना है। मैंने कहा तुम उड़ो , आकाश नापो जब मन करे, जब मन भरे अपना जाला बुन लेना अपनी जंजीरें गढ़ लेना