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घोरघट की चीखें

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  भूत होते हैं क्या? या, कुछ पल ठहर जाते हैं, काल खंड में विलीन होने से बच जाते हैं। जैसे राख के नीचे सुलगते बोरसी के अंगारे। अगर किसी ने उन्हे खोर दिया, तो अंगारे भभक पड़ते हैं। चलें, छोड़ें, कहाँ की कहाँ ले बैठा। बचपन में शहर से ननिहाल गाँव जाने में एक उत्साह नदी में नहाने का भी रहता था। कहते हैं, भगवान राम ने, वन जाते समय अपनी पहली रात, अयोध्या वासियों के साथ इसी तमसा नदी के तट पर बिताई थी। अंग्रेजों ने इसका नाम “टोंस” रख दिया। गाँव के मुहाने पर, प्रवेश करने से पहले, यह नदी समकोण पर दायें घूम जाती है। निरंतर प्रवाह ने उस जगह की माटी बहा कर खोह बना दिया था। वहाँ की गहराई बहुत ज्यादा है। बरसात के बाद, नदी जब पूरे शबाब पर होती, उसमें भँवर भी पड़ते हैं । पुराने लोग बताते हैं, जलधार, मँझधार, भँवर के साथ वेगवती नदी उनदिनों, बड़े अनुभवी नाविकों को भी चुनौती देती थी। बरसात तो छोड़ दें, अन्य दिनों में भी, जब हम सभी बच्चा पार्टी, नदी में नहाने जाती थी, तो उम्रदराज बच्चों पर जिम्मेदारी होती थी – घोरघट की तरफ नहीं जाना है। जबतक हम बच्चे थे, बड़ों का कहा मान लेते थे। जब हम खुद ही खुद को ...

राज ज्योतिषी -३ (अंतिम भाग)

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गंगा घाट पर आरती हो चुकी थी। गंगा शांत लहरों में  बह रही थी, जैसे वाराणसी से आगे  गंगा सागर तक की यात्रा की तैयारी कर चुकी हो। संध्या अब रात्रि में परिवर्तित हो रही थी। चंद्र किरणे गंगा की लहरों पर अठखेलियाँ कर रहीं थी। घाट की भीड़ कम हो चली थी।  आचार्य महेंद्र मिश्र गंगा घाट के तट पर अवस्थित हवेली के दालान में अपने आसन पर बैठ रामायण पढ़ रहे थे। उनकी दिनचर्या रामायण से ही समाप्त होती थी।  आज एक चौपाई जैसे मन में ही अटक गई -  "सुनहु भरत भावी प्रबल , बिलख कहेउ  मुनिहु   नाथ हानि लाभ जीवन मरण ,यश अपयश विधि हाथ।" भावी और भवितव्य से उनका भी तो कभी पाला पड़ा था।   विश्व विद्यालय से शास्त्री की परीक्षा पास करने के बाद, महेंद्र मिश्र, संकट मोचन  मंदिर के मुख्य पुरोहित के शिष्यत्व  में  ज्योतिष विद्या का व्यवहारिक  ज्ञान अर्जित करने में लग गए।  सहूलियत के हिसाब से, उन्हें एक ठौर मिली गंगा किनारे एक पुरानी हवेली में। महेंद्र मिश्र , गांगुली  महाशय  के किरायेदार हुए। वृद्धावस्था में सहारे के लिए गांगुली महोदय की...

राज ज्योतिषी - भाग -2

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वसंत पंचमी की सुबह, महेंद्र मिश्र की वेद पाठशाला में चहल पहल थी। आज से नए वेद पाठी छात्र, माता सरस्वती की उपासना कर वेद पाठ के  प्रथम सत्र का शुभारंभ करने वाले थे।  अभिभावकों के साथ आए सद्यः स्नात, नवीन वेषधारी वेदपाठी प्रशिक्षु बालक सहमें बैठे हुए थे। वहीं पुराने छात्र, पीत आवरण व धोती पहन इधर से उधर व्यस्त से डोल रहे थे। उनकी एक आँख, नव छात्रों पर भी लगी थी। जब भी नव-छात्र बाल सुलभ कलरव शुरू करते, पूर्ववर्ती छात्र आँखे तरेर कर अनुशासन स्थापित करते।  पंडित महेंद्र मिश्र नें तैयार हो, तिलक लगाते हुए, एक बार खिड़की से आँगन में झांक लिया। आँगन में सरस्वती प्रतिमा के आस पास का कोलाहल, उन्हें अनायास ही अपने बाल्य काल में लेकर चल पड़ा। जब, "वीणा वादिनी  वर दे..." का उनका  सस्वर पाठ सुधि जनों का ध्यान आकृष्ट करता था।  स्मृतियाँ उन्हे लेकर उनके गाँव पहुँच गईं, उस वसंत पंचमी को उनके पिता कैलाश मिश्र उन्हे माता सरस्वती की महिमा समझा रहे थे।  कैलाश मिश्र की आजीविका, पुरोहिताई से चलती थी। गाँव के मंदिर की पूजा का भी भार उनके उपर ही था।  यजमान के घर कथा बाँचने ...

राज ज्योतिषी (1)

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  वसंत पंचमी की सुबह गंगा घाट पर थोड़ी भीड़ तो थी , पर , पंडित महेंद्र मिश्र को स्नान करने में कोई दिक्कत न हुई।   सभी जानते थे , सुबह सूरज उगना भूल जाए पर नियत समय पर ठीक 5 बजे , मिश्र जी जरूर नहायेंगे। नहाते समय  ठोस आवाज में  जब पंडितजी  स्नान मंत्र पढ़ते , तो लगता साक्षात शंभू के दर्शन हुए।   नहाने के बाद बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ा कर ही मिश्र जी की दिनचर्या प्रारंभ होती थी ।   अगला कदम उदय चौरसिया की दुकान से चाय की दो प्याली के बाद पान खा कर ही उठता था।   उदय से उनकी जान पहचान बहुत पुरानी थी। कचोड़ी गली के नुक्कड़ पर जब मिश्र जी विद्यार्थी के तौर पर आए थे , तब , से। उदय तब 10 साल का रहा होगा।   एक उदय ही था जो मिश्र जी से थोड़ी ठिठोली कर सकता था।   उस दिन दुकान पर आते ही उसने तुक्का छोड़ा, यह जानते हुए भी कि, बाबा हाथ देखने से नफरत करते हैं ,और, वर्षों से सीखी  ज्योतिष विद्या कबके त्याग चुके हैं।     “का बाबा , बहुत जबरदस्त लागत हौआ , हमार हाथ देख के बताव त , कब तक शनि तबाह करी। साढ़े साती खतमे नई...

भाई सहोदर कभी न मिलिहैं , चाहे कोटी करो उपाय

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उम्र के उस पड़ाव पर, जब देखने को कुछ ज्यादा बचा न हो, तो मन पीछे भाग कर स्मृतियाँ जुटाता है। इसी तरह की एक डुबकी, मुझे आल्हा उदल की गाथा में ले गई।  एक डुबकी, एक न रही, मन ही दरिया हो गया।  मैं बह चला।  यू  ट्यूब  में आल्हा सुनता रहा। आल्हा उदल की कहानी तो पता थी। लेकिन, एक प्रसंग ऐसा मिला, जो आज की हिसाबी किताबी पीढ़ी से कहीं आगे है।  आगे बढ़ने से पहले एक प्रसंग परिचय का:  जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं. मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन 1250 में लिखा गाया था .  भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही..... लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. मतलब ये कि वह गाथा जिसे गा कर सुनाया जाये लोकगाथा कहलाती है. "रन में दपक -दप बोले तलवार, पनपन-पनपन तीर बो...

क़यामत की रात, सुनहरा सवेरा

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  1969 फरवरी आज सोचता हूँ, कितना खुश था मैं, घर में एक छोटे भाई को पा कर। तब हम मीठापुर के दो कमरों के घर में हंसी खुशी चार प्राणी रहते थे - पापा, माँ और हम दो भाई। घर का नियम था - एक संडे छोड़ दूसरे संडे, वीणा या अशोक टॉकीज में सिनेमा जाना- जिस संडे सिनेमा नहीं जाना उस संडे, हार्डिंग्स पार्क जाना। बबलू के रहने से रौनक आ गई थी। तीन साल की उम्र हो चली थी। उस समय धर्मेन्द्र माला सिन्हा की फिल्म आंखे का गाना " दे दाता के नाम, तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे" बहुत चला हुआ था। हम सभी कंकरबाग ( उस समय 900 बीघे के नाम से जाना जाता था), अपनी मौसी के घर गए थे। उनका घर अभी बन रहा था। हम बच्चों को घर के बाहर बालू के टीले पर मजा आता था। हम बालू के किले बनाते, किले तक के रास्तों को अपनी चप्पलों से समतल करते। पास की तलैयों के साफ पानी में रंग बिरंगी छोटी मछलियाँ मिलती थीं। उस दिन हम सभी, मैं, बबलू, मेरी मौसेरी बहन मनी, घंटों बालू और पानी में खेलते रहे। बबलू खुश था -- आँखें का गाना गा रहा था - दे दाता के नाम, तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे" उस शाम हम सभी शाम का खाना खा कर कंकरबाग ...

किराए की माँ

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 खलारी की पहाड़ियों में 1997 की सर्दियाँ आ चुकी थीं। सुबह कोहरे का प्रकोप के कारण ,10 बजे की, मुख्यालय भेजी जाने वाली रिपोर्ट में , Loss of Production  due to fog , का जिक्र प्रमुखता से होने लगा था। उस दिन सुबह  चेक पोस्ट से गुजरते समय, मैं थोड़ी देर रुका था। सुजय तिवारी, चेक पोस्ट पर मुंशी के तौर पर ड्यूटी पर थे। खदान के प्रबंधकों की दिनचर्या में , चेक पोस्ट पर थोड़ी देर रुक कर खदान और समाज की रिपोर्ट लेना, एक अहम पहलू होता है। चेक पोस्ट एक हिसाब से खदान का नर्व सेंटर होता है। वहाँ हर शिफ्ट में जमा होने वाले, स्टाफ, ठेकेदारी कर्मचारी, ड्राइवर, पे लोडर आपरेटर , खैनी की चुटकी के साथ आस पास की कालोनियों में होने वाली उथल पुथल भी बांटते हैं। गोया यूं , आपने सुबह का अखबार न भी पढ़ा हो, तो भी समाचारों से महरूम न रहेंगे। सुजय ने खदान में चल रही मशीनों की जानकारी दी। रात पाली में अच्छा ट्रिप निकला था। कोहरे के बावजूद, रात पाली जल्दी शुरू कर पूर्वार्ध में ही ज्यादा कोयला निकाल लिया गया था। अमूमन चार बजे सुबह से आठ बजे तक कोहरा आ जाता है, उस समय खदान से निकलते टिप्पर धीमी गति...

बूढ़ी आँखों के आँसू

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 कुछ लम्हे यदाश्त में यूं चस्पा हो जाते हैं, कि छूटते ही नहीं। बात दीगर है, कि उनके मायने बहुत बाद में, अनुभव बढ़ने पर समझ आते हैं। मन, उस पल को सहेज कर बार बार जीता है।    सन १९७५ की गर्मियों में, एक शादी के सिलसिले में अपने ननिहाल चितबड़ा गाँव गया था। उस साल मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। बचपन में ननिहाल जाने का मतलब - "आजादी" - पूर्ण स्वराज। माँ अपने मायके में अनुभव बांटने में व्यस्त, पिताजी, ससुराल में होने के कारण सौम्यता के मूर्तिमान स्वरूप। बच्चे अपने हम उम्रों के साथ धींगा मस्ती को स्वतंत्र। यही तो था - पूर्ण स्वराज - कभी खेत में, कभी नदी में, कभी भैस की पीठ पर। जब भी, जो भी...  लव भैया मेरे मौसेरे भाई, मेरी दुनिया के गाइड उन दिनों दसवीं में होंगे। मौसी की शादी भागलपुर के तरफ हुई थी, जबकि, लव भैया की बुआ पास में ही उसरौली गाँव में ब्याही थी।  एक दिन लव भैया के साथ उसरौली जाने का कार्यक्रम बना। सुबह मुँह हाथ धोकर कुछ खाकर, हम दोनों उसरौली के लिए निकल पड़े। जाने का रास्ता सीधा है - चितबड़ा गाँव बाजार, फिर रेल गुमटी और, गाजीपुर बलिया रोड पार करके बरैया के पोखरा ...

" राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 6 एक डोर जुड़ गई "

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 सन 2000 समय अपनी गति चलता रहा।। घर के सभी बुजुर्ग जा चुके थे, अब मेरे पापा श्री राजकुमार मिश्र बैंक की नौकरी से सेवा निवृत हो पटना में बस चुके थे। पटना आरा और बक्सर हो कर गाँव जाने में करीब चार घंटे का समय लगता था। माँ और पापा अब गाँव और पटना के बीच समन्वय बनाए हुए थे। दुलारी दादी के जाने के बाद अब मेरा गाँव मेरी यादों में ही बसता था। गाँव जाना कम हो गया था। जाने से भी अनजाना सा लगता। गाँव भी अब गाँव कहाँ रहा - पहले रोड बनी, फिर बस चली, पहली बार बस जहां रुकी, वहीं चट्टी बन गई, चट्टी के रास्ते शहर नें सेंध लगाई। अब ग्रामीणों का शाम को चट्टी जाकर चाय की टपरी पर बैठना शगल हो गया। मैं जब भी गाँव गया, मेरा ज्यादा समय शिवाला पर , मंदिर की सीढ़ियों पर दुलारी दादी की यादों के आँचल तले बीतता था। खैर, एक दिन पापा का फोन आया - एक हफ्ते बाद फ़िजी से कोई अरीदयाना आने वाली है। अगर हो सके, तो गाँव पर आ जाओं , हम भी जा रहे हैं। ( विगत कुछ दिनों से नॉकरी में मेरी मशरुफियात देखते हुए पापा अब औपचारिक वाक्यांश "अगर हो सके तो" जोड़ने लगे थे। ) खैर नियत दिन के दो दिन पहले हम सभी पहुँच कर घर की सा...

" राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 5 राज दुलारी से दुलारी दादी तक"

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 राम दहीन द्वारा लोचन मिश्र का समाचार मिलने के बाद जैसे राज दुलारी को काठ मार गया। घर के सभी काम तो करतीं थीं लेकिन यंत्र वत। बहु की हालत देख कर कैलाश मिश्र और उनकी पत्नी लोचन को कोसते रहते। कैलाश मिश्र टूट चुके थे। मंत्र अब बेमानी लगते थे। किसी तरह पुरोहिताई निभा देते थे। फुलेश्वर मिश्र अभी  छोटे थे। बाबूजी के साथ जजमान के यहाँ जाकर  संवयस्क बालकों  में खेलने लगते। जीमावन के समय प्रकट हो पूड़ी दही खाकर तृप्त हो आते। बेशक, पढ़ाई लिखाई में अव्वल आते थे।  गाँव वाले सोहारी से मुक्ति दिलाने में लोचन के योगदान को भूले नहीं थे। हर घर नें जैसे इस घर की जरूरतों को बाँट लिया था। जीवन यापन की सभी सामग्री सब जुटा देते। बूचन काका मुसलमान थे - उन्होंने अपने  योगदान स्वरूप  कैलाश मिश्र और उनके परिवार के कपड़े आजीवन सील कर अपनी हिस्सेदारी निभाई। सोहारी जाते जाते पूरे गाँव को एक कर चुका था। संभवतः इस लिए भी, पीढ़ी दर पीढ़ी सोहारी की हत्या और गाँव की एका की कहानी जीवित रही। इस कहानी को बड़े नहीं कहते थे। इसे किशोर वय के युवक मेरे जैसे शहरी बालक को गाँव की महानता में दीक्षित ...

 " राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 4 "फिजिया के टपुआ में रूपिया ही रूपिया , बैठले जहाजवा में किस्मत बिदेसिया"

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 नई दुल्हन के आने से  पुरा घर संगीत मय हो जाता है, कभी पायल की रूनझुन, तो कभी चूड़ियों की खनखन। लोचन और राज दुलारी की आपस में बात ज्यादा नहीं होती थी। खाना देते समय, पीढ़े पर बैठे लोचन और दरवाजे की आड़ में बैठी दुलारी आपस में कनखियों से एक दूसरे को देख लेते। नजर मिल जाने पर नवोढ़ा दुल्हन, शर्म से छुई मुई हुई जाती थी। लोचन के घर पर रहने के समय, दुलारी और भी भरी पूरी महसूस करती थी। पायल और चूड़ी उस समय कुछ ज्यादा ही बजती थी। सासु माँ , सब कुछ समझ गुन कर अनजान बनी, पड़ोसन के घर जाने का कह, ऐसे मौकों पर निकल जाती। दिन  अच्छे कट रहे थे। उन दिनों लड़की का विवाह पछिम करने की प्रथा के कारण, दुलारी के मैके के आस पास की कई लड़कियां, इस गाँव में ब्याही थीं । अब वे दुलारी से मिलने आने लगीं । अंधेरा ढले या पौ फटने से पहले घर से बाहर जाने वाली टोली में अब दुलारी भी शामिल हो गई। भर रास्ते , आपस में  हँसती बतियाती एक दूसरे का भेद भी सांझा करतीं। ससुराल के कष्ट और यहाँ जीने के तरीके भी समझाती। ऐसे ही एक दिन बतकही निकल गई - इस गाँव के मर्दों पर। कंचन बो ने बात छेड़ी - बलिया जिला के नवहा अ...

राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया (भाग -3 "और अजोरिया फईल गइल " )

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 बीसवीं सदी पूर्वार्ध (1912-13 )- गाँव अमवां, तहसील मुहम्मदाबाद गाजीपुर करीब 50 घर की बस्ती। 34 घर राजपूत, 1 घर ब्राह्मण , बाकी अन्य ।। लोचन मिश्र के बाबूजी श्री कैलाश मिश्र, यानि हमारे परदादा पुरोहितायी से जीवन भरण करते थे। करीब चार बीघे की अर्द्ध सींचित भूमि, और गाँव के सभी घरों से सीधा (अनाज) मिलाकर, कोई कमी नहीं थी। कान्यकुब्ज ब्राह्मण होने का गर्व, उनके उन्नत भाल -कपाल और गौर वर्ण कुलीन होने का संकेत देते थे। ज्यादा पढ़े तो न थे पर मंत्र और कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि कंठस्थ थी। लोचन इसके उलट कल किसने देखा है, वाली निश्चिंतता के साथ आज में ही जीते थे। रसड़ा के प्राइमेरी स्कूल में जाने के रास्ते में, अपने मित्रों के साथ सरजू नदी की रेत में बैठ कर तरबूजे खरबूजे खाते। मन किया तो उढ़ा भी कूद लिया। कभी पछिमा ताल पर जाकर पंडुक चिरई देखते थे । यादव मित्रों की संगत में पुरबिया तान में बिरहा, रामायण, आल्हा गाना सीख रहे थे। राजपूत मित्रों के साथ कुस्ती, मलखंब और अन्य करतब सीख रहे थे। ब्राह्मण होने के कारण, उनके सहपाठी उनपर कभी हाथ नहीं उठाते थे। उन्हें प्यार से लोचन बाबा कहते थे। ल...

राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया

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 हावड़ा स्टेशन के रास्ते जाते हुए, जब भी बड़ा बाजार इलाके से गुजरता हूँ, मन जैसे विचार शून्य हो जाता है। अल सुबह खाली होते या लोड होते ट्रक, और अति व्यस्त लोडिंग मजदूर, पुराना घाव उकेर देते हैं। एक ही धुन गूंज पड़ती है - " राह तकत अँखिया सूनी भई, लोर गए सूख रे, बिदेसिया.. " पता नहीं क्यों दुलारी दादी सफेद साड़ी पहने, सामने खड़ी दिखती हैं। उनकी सूनी आँखों से भागने के लिए कई बार मैंने ड्राइवर को रास्ता बदल कर इ एम बाई पास की तरफ से भी लेने को कहा है। हालांकि, अतीत से कोई भाग सका है क्या ? फिर भी.. दुलारी दादी के हाथ से इतनी बार दाना भुजा खाया है, इतनी बार उसकी छाया में सोया हूँ, कि, उसकी गंध आज भी मेरे लिए पुर सुकून इत्र है। मेरे गाँव आने से एक हफ्ते पहले ही, नए धान का चूड़ा , छान फटक कर , मोटी लाल छाली वाली दही की व्यवस्था कर इंतज़ार करती थी। दादी मानती नहीं है। मेरे लाख समझाने  पर भी कि , आज की पीढ़ी इंटरनेट, इंस्टाग्राम वाली है, इसे विदेसिया या लोचन मिश्रा की कहानी में क्या इंटेरेस्ट होगा सन 1980 की गर्मियों में जाते जाते भी, आँख मूदने से पहले, उसने मेरा हाथ पकड़ कर ,भर...

सुबह की चाय

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 कोलकाता की  सुबह शुरू होती है, लगभग हर नुक्कड़ पर बनती ताजी चाय की खुश्बू से।  सुबह की तफरी में, दिल पर काबू रखना मुश्किल होता है। न जाने कब फिसल जाए और आप डाइबीटीज और तमाम खतरे को भूल कर किसी चाय दुकान पर खड़े मिलें।  ताजे औटे गए दूध में उबलती पत्तियाँ..  और सुबह की शीत समीर  दोनों मिलकर चित-बरबस करने को काफी हैं।  यहाँ कुल्हड़ का प्रचलन आज भी है।  कुल्हड़ की सोंधी महक, चाय के स्वाद को और भी बढ़ाती है।  बात छेड़ने की गर्ज से, यह पूछना आम है, " चाय कैसी है? ठीक तो बनी है।"  एक दिन अल सुबह, सपत्नीक मैं एक नए रास्ते में टहलने गया था।  घर लौटते हुए एक नुक्कड़ पर, चाय बनाने वाली महिला से वही सवाल पूछ बैठा - " चाय कैसी है? ठीक तो बनी है।" महिला संभवतः बनारस की थी। मेरे लहजे को पहचान गई।  उसने बाजी पलटी - " बाबूजी, कोई अपनी बेटी को खराब कहता है क्या? आप चाय पी कर खुद ही बताएं - कैसी बनी है।  मैं तो अपनी चाय को अच्छा ही बोलूँगी।" बात की गहराई समझ कर पत्नी और मैं मुस्कुरा पड़े। आज की सुबह बन गई थी।  बात दीगर है, आगे कभी मैं किसी से ...

मुंडेर पर गिद्ध

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  राम खेलावन जी ने एक चुटकी खैनी करीने से निचले होंठ और दांतों के बीच में दबा कर चिंतित स्वर में कहा - पता नहीं कब खदान से कोयला आएगा। लगता है, आज भी शाम ढले तक बक्सा भरते रहेंगे। चिंता की लहर सभी के चेहरों पर , झुर्रियों के बीच फिसलते चली गई। कोलियरी के वैगन लोडर गैंग की यह रोजमर्रा की बात थी। कोयले का इंतज़ार।। कुछ चतुर सुजान गैंग लीडर रात को ही टिप्पर चालकों और खलासी बंधुओं के साथ सेटिंग करके सुबह सुबह कोयले का इंतेजाम कर लेते थे। राम खेलावन आज चूक गए थे। माहौल को ठंडा करते हुए बिसेसर ने गमछे को फटकार कर माथा में बांधते हुए कहा - राम खेलावन भैया, खुश रहिए, आज रैक लोड नहीं होगा। बाकि साथी हंस पड़े। बिसेसर वा पगला गया है। भविष्य बता रहा है।। कुछ ही देर में पायलट इंजन की सिटी सुनायी पड़ी। उलटे तरफ से रैक ठेलते हुए पायलट सिटी पर सिटी मारता हुआ आ रहा था। जैसे ही रैक का पहला बक्सा साइडिंग में घुसा .. यह क्या.. बिसेसर नीचे रेल लाइन पर कूद गया। मजदूरों की आँखें बंद हो गई। जब खुली, बिसेसर तीन टुकड़ों में बंटा हुआ था। गमछा वैसे ही सर पर बंधा था। आँखें खुली थी.. अफरा तफरी मच गई। लाश...