" राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 6 एक डोर जुड़ गई "

 सन 2000

समय अपनी गति चलता रहा।।
घर के सभी बुजुर्ग जा चुके थे, अब मेरे पापा श्री राजकुमार मिश्र बैंक की नौकरी से सेवा निवृत हो पटना में बस चुके थे। पटना आरा और बक्सर हो कर गाँव जाने में करीब चार घंटे का समय लगता था। माँ और पापा अब गाँव और पटना के बीच समन्वय बनाए हुए थे।

दुलारी दादी के जाने के बाद अब मेरा गाँव मेरी यादों में ही बसता था। गाँव जाना कम हो गया था। जाने से भी अनजाना सा लगता। गाँव भी अब गाँव कहाँ रहा - पहले रोड बनी, फिर बस चली, पहली बार बस जहां रुकी, वहीं चट्टी बन गई, चट्टी के रास्ते शहर नें सेंध लगाई। अब ग्रामीणों का शाम को चट्टी जाकर चाय की टपरी पर बैठना शगल हो गया।

मैं जब भी गाँव गया, मेरा ज्यादा समय शिवाला पर , मंदिर की सीढ़ियों पर दुलारी दादी की यादों के आँचल तले बीतता था।

खैर, एक दिन पापा का फोन आया - एक हफ्ते बाद फ़िजी से कोई अरीदयाना आने वाली है। अगर हो सके, तो गाँव पर आ जाओं , हम भी जा रहे हैं। ( विगत कुछ दिनों से नॉकरी में मेरी मशरुफियात देखते हुए पापा अब औपचारिक वाक्यांश "अगर हो सके तो" जोड़ने लगे थे। )

खैर नियत दिन के दो दिन पहले हम सभी पहुँच कर घर की साफ सफाई कर उसे आगंतुकों के स्वागत हेतु तैयार कर चुके। एक दिन पहले मोहम्मदबाद से ए डी एम साहब भी आकर मिल लिए। उन्हीं से पता चला, बराये रास्ते फ़िजी - फ़िजी हाई कमिशन - दिल्ली- विदेश मंत्रालय - चीफ सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश - डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर गाजीपुर - एडीएम मोहम्मदबाद - टेलेक्स संदेश से मिसेस अरीदयाना मिसिर का अमवा में श्री कैलाश मिश्र के घर आने का कार्यक्रम तय हुआ है।

अरीदयाना के आने वाले दिन से पहले की रात , मुझे घर में एक अजीब नूर का अनुभव हुआ, जैसे सभी स्मृतियाँ, आत्माएं, जड़ और चेतन एक मुस्त हो अपनी कहानी सुनाने के लिए अधीर हो रहे हों।

अरीदयाना के साथ आया सरकारी अमला , हमारे साथ चाय आदि के औपचारिकता के बाद जा चुका था। पहली नजर में किसी एयर पोर्ट पर मिलते तो अरीदयाना एक कॉर्पोरेट इग्ज़ेक्यटिव लगती- हल्का सावला रंग, सधा हुआ शरीर, कॉर्पोरेट सेमी फॉर्मल ड्रेस, स्कार्फ और gucci का पर्स।

खैर, घर में और घर के बाहर मेला लगा हुआ था। पूरा गाँव और जवार जमा था। माँ उनकी बहु प्रीति, पोती सुरभि और गाँव की अन्य महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से आरती उतार कर स्वागत किया। हम सभी अभिभूत हुए, जब अरीदयाना नें बड़ों के पैर छूए और हिन्दी में पूछा - आप सब कैसे हैं, मैं लोचन मिसिर की पोती हूँ, दादाजी गाँव की कहानियाँ सुनाते थे। 1975 में उनके अंत काल के बाद, यहाँ आना टलता रहा। अब आ पाई हूँ।

कौतूहल की भीड़ जाने के बाद जब हम अपने पर हुए तो एक बार वंशावली मिलाई गई। हमारी तरफ - श्री कैलाश मिश्र- के दो बेटे - श्री लोचन और श्री फुलेश्वर, श्री फुलेश्वर के बेटे श्री राजकुमार और उनका बेटा मैं ।। दूसरी तरफ - श्री लोचन मिश्र - पत्नी मिसेस मेरी, पुत्र मिस्टर वाशी मिसिर, उनकी बेटी अरीदयाना मिसिर । ( मेरा मानना है, अरीदयाना अगर भारत में होती उसका नाम संभवतः आराधना मिश्र होता।

लोचन मिश्र जिनसे माफी मांगते वो सभी जा चुके थे। हम भी उन्हे बिसार चुके थे। अब एक तटस्थ भाव से हम सभी अरीदयाना से उसकी कहानी सुन रहे थे। सुरभि तो जैसे अरीदयाना की प्रोटोकॉल ऑफिसर ही हो गई थी। प्रीति माँ के साथ खाने पीने और अन्य सुविधाओं का खयाल रखते हुए, ध्यान बैठक में ही लगाई हुई थी।

अरीदयाना ने जो बताया उससे मैं जो समझ सका -

लोचन, दुलारी से मिलने के सपने में छलांग तो लगा चुके थे, जहाज चल पड़ा था। यात्रा महीनों की हो गई। हिन्द महासागर से प्रशांत महासागर उसमे ऑस्ट्रेलिया से आगे फ़िजी ।

विदेसिया की तर्ज पर-
"जियरा डराए घाट क्यों नहीं आए हो बीते दिन कई भए मास रे बिदेसिया
आई घाट देखा फिजिया का टपुआ हो , भया मन उदास रे बिदेसिया "

नुवा के घाट पर उतरते ही सभी सीएसआर कंपनी के गिरमिटिया हुए और, कुलम्बर ( इन चार्ज)और सरदार ( सूपर्वाइज़र) के अत्याचार के भागी हुए।

 बिसदेसिया की तर्ज पर

"सब सुख कहाँ सी एस आर की कोठरिया, छे फीट चौड़ी, आठ फूट लंबी
उसी में धरी है कमाने की कुदारिया उसी में सिल उसी में चूल्हा
उसी में धरी है जलाने की लकारिया उसी में महल उसी में दो महला
उसी में बनी सोने की अट्टरिया "
काली कोठरिया मा बीते नहीं रतिया हो, किस से बताए हम पीर रे विदेसिया
दिन रात बीती हमारी दुख मे उमरिया हो, सूखा सब नैन के नीर रे बिदेसिया

शनिवार की शाम गुलजार होती थी, क्योंकि दिन में चीनी मिल वाले मजदूरी देते थे। उस शाम कुली लाइन में अच्छा खाना बनता और, लोचन मिश्र के गले से सरस्वती फूट पड़ती थी रामायण के रूप में - पुरबिया समुदाय भाव भी भोर हो जाता।
"तुलसी भरोसे राम के निर्भय हो कर सोएं
अनहोनी होनी नहीं होनी होय सो होय"

रात को अकेले कोठरी में सोते वक्त कैलाश मिश्र सपने में आते - और पूछते
" विदेश गमन , ऊसर मरण , अब ही का बाकि बा"
लोचन पसीने पसीने हो उठ जाते और एक गिलास पानी गटक के शांत होते।

सोमवार सुबह से फिर वही कुलम्बर और सरदार के अत्याचार।।

जैसे तैसे 1920 आया, इन्डेन्चर सिस्टम बंद हुआ, गिरमिटिया आजाद हुए लेकिन वापस भारत जाने के पैसे नहीं थे और शायद घर वालों का सामना करने की हिम्मत भी नहीं थी। लोचन मिश्र भी ऊहापोह में थे।

विधि का विधान अलग होता है।
लोचन नें फ़िजी के दस्युओं द्वारा एक अंग्रेज प्लांटर की जान बचाने के बाद, उसके परिवार के निकट हुए। गोरा जाते जाते अपनी बेटी मेरी और ऊख का प्लैन्टैशन उन्हें सौप गया। मेरी और उसके पिता बरास्ता बनारस , इंग्लंड से फ़िजी आए थे। इसलिए मेरी और लोचन का साथ निभा। अच्छा निभा।

बनारस की खासियत है, जो यहाँ आया या जो यहाँ से गुजरा, उसे बाबा विश्वनाथ के रंग में रंग लेता है। ( मिर्जा गालिब का आख्यान पढ़ें - पेंशन के सिलसिले में दिल्ली से कलकत्ता जाते करीब एक माह रहे थे - उन्होंने बनारस के, उसके घाट और उसके रहने वालों के किस्से बयान किए हैं - वो आश्चर्य करते थे - यहॉं के मुसलमान भी भजन गाते हैं )

खैर, श्री लोचन मिश्र अब मिस्टर लोचन मिसिर हो गए थे, उनके बेटे मिस्टर वासी मिसिर ने व्यवसाय और भी बढ़ाया।
जब उम्र हुई, लोचन अब ज्यादा समय अपने विशाल बंगले की balcony से प्रशांत महासागर की लहरों को देखते बिताने लगे)। पुरानी यादें कहाँ छोड़ती है। दुलारी का ख्याल आता। उसे धोखा दिया ऐसा लगता। लगता अभी भी नव व्याहता उसी तरह मुसकुराती उनका इंतजार कर रही है। नींद की गोली भी उन्हे सुला नहीं पाती ।

लोचन मिश्र को सुकून मिलता अरीदयाना से बात कर। उन्होंने अरीदयाना का बचपन देखा था। अब सुनहरे सपनों लिए चंचल चपल बालिका के रूप में बदलते देख रहे थे।

लोचन अपनी पोटली अरीदयाना के साथ बांटते थे। गाँव के किस्से, सरजू नदी, लखनेसर डीह का मंदिर, दुलारी से शादी और दुलारी को छोड़ फ़िजी आ बसना । अरीदयाना से बात कर लोचन उतने ही हल्के होते जीतने हम चर्च में कन्फेशन या मंदिर में भगवान से दुख बाँट कर होते हैं।

1975 में मृत्यु के समय लोचन मिसिर ने अरीदयाना से वचन लिया था कि वह एक बार गाँव जाएगी, उनकी माफी मांगेगी और उनकी राख बनारस में गंगा में बहाएगी. वचन में बांध कर लोचन चल पड़े।

अरीदयाना ने एक चुटकी लोचन की राख सहेज कर रख लिया था।

गाँव में दूसरे दिन माँ प्रीति सुरभि और अन्य महिलाये, सती माई, मठिया, और शिवाला के दर्शन कर लायीं। सती माई के मंदिर पर महिलाओं ने बेटी के लौटने पर गाए जाने वाले पारंपरिक गीत गाए। शिव मंदिर पर रुद्राभिषेक हुआ। अरीदयाना यहॉं आकर अपनत्व के समुंदर में विलीन हो गई थी। मुझे ऐसा लगा, दुलारी दादी ने भी अरीदयाना को आशीसा है।

दूसरे दिन वापसी में हम सभी बनारस गए। दशासवमेध घाट से नाव लेकर लोचन मिसिर की राख प्रवाहित की गई।
अरीदयाना बरास्ता कोलकाता सिंगापूर फ़िजी चली गई। एक नया रिश्ता बन गया।। एक डोर जुड़ गई....

इति 


  

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