इसने सब देखा है ..
मकान से घर बनने के सफर में, चीजें जमा करता ही गया . किताबें, कपड़े, खिलौने, बरतन.. उनके साथ जुड़ गई यादें। यादों के धागे से बुनता गया अतीत। अरसे बाद, जब भी आता हूँ , बेहिसाब, खुश होता है, साफ सफाई के बाद, तसल्ली से, यादों का पिटारा खोलता है, जैसे, माँ अपने पुराने बक्से खोला करती थी, बच्चे, उत्सुक दीद, हतप्रभ बैठे रहते थे। इसने सब देखा है, नई बहु के आने की खुशी, हमारी, नई नौकरी, नया शहर, नया परिवार, नया मकान, दर ब दर यायावर, हमारा बुजुर्गों में तब्दील होना इसने सब देखा है माता पिता का अंतिम संस्कार हमारा इंतजार करते, उनकी बेचैनीयां, उनकी चिंता, कि बच्चे उनके जीवन की साँझ यहीं बिताएगे न ? किसे पता कि एक बार जो गया मुश्किल से लौटता है कुछ अपना करने की चाहत में कितने मकान और बना लेता है। पुराना घर, राह तकता है हमारे बच्चों के वापस आने का अपने जर्जर होते वजूद से उनके लिए कुछ यादें, कुछ आवाजें ...