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सुबह सवेरे

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  सुबह सवेरे टहलते हुए, दिखती हैं बंद खिड़कियां खाली बालकोनी, सूने छज्जे मकान बिकते हैं Sea Facing, Lake Facing Best View Mountain view न जाने कितने वादों के साथ बात दीगर है, आज तक दिखा नहीं कोई बैठा सुकून के साथ चाय का प्याला, सुबह का अखबार, सहचरी का साथ सुनहरी धूप, मंद समीर जीवन की आपाधापी निगल लेती है सब कुछ क्या हुआ, क्या हो सकता था क्या होगा , तीन प्रश्नों में उलझा मन टालता है, फुरसत के क्षण कभी सप्रयास ही सही, या, यूं ही, बैठें, उनके साथ थामें हाथ, और, कभी तो कहें भाँड़ में जाए दुनिया और, दुनिया के गम हम - तुम हैं साथ साथ  इस क्षण में, एकांत.. सुबह की चाय, के साथ,  कुछ समय तो बिताएं,  Terrace पर... आज 

बूढ़ी आँखों के आँसू

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 कुछ लम्हे यदाश्त में यूं चस्पा हो जाते हैं, कि छूटते ही नहीं। बात दीगर है, कि उनके मायने बहुत बाद में, अनुभव बढ़ने पर समझ आते हैं। मन, उस पल को सहेज कर बार बार जीता है।    सन १९७५ की गर्मियों में, एक शादी के सिलसिले में अपने ननिहाल चितबड़ा गाँव गया था। उस साल मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। बचपन में ननिहाल जाने का मतलब - "आजादी" - पूर्ण स्वराज। माँ अपने मायके में अनुभव बांटने में व्यस्त, पिताजी, ससुराल में होने के कारण सौम्यता के मूर्तिमान स्वरूप। बच्चे अपने हम उम्रों के साथ धींगा मस्ती को स्वतंत्र। यही तो था - पूर्ण स्वराज - कभी खेत में, कभी नदी में, कभी भैस की पीठ पर। जब भी, जो भी...  लव भैया मेरे मौसेरे भाई, मेरी दुनिया के गाइड उन दिनों दसवीं में होंगे। मौसी की शादी भागलपुर के तरफ हुई थी, जबकि, लव भैया की बुआ पास में ही उसरौली गाँव में ब्याही थी।  एक दिन लव भैया के साथ उसरौली जाने का कार्यक्रम बना। सुबह मुँह हाथ धोकर कुछ खाकर, हम दोनों उसरौली के लिए निकल पड़े। जाने का रास्ता सीधा है - चितबड़ा गाँव बाजार, फिर रेल गुमटी और, गाजीपुर बलिया रोड पार करके बरैया के पोखरा ...

ईश्वर को जिम्मेदारी से मुक्त करें.

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 एक प्रश्न चिरंतन है- संसार की रचना किसने की? अभी समझ आया है- किसी ने नहीं।  तो, हम अस्तित्व में कैसे आए ?  अभी समझ आया - ईश्वर नें अपने आप को जड़ और चेतन दोनों रूपों में प्रकट करता है।  The universe is expression of the God. अगला प्रश्न - तो ज्ञानी, जगत मिथ्या है, ऐसा क्यों कहते हैं?  उत्तर होगा - क्योंकि, संसार वस्तुतः व्यक्ति विशेष की चेतना और अनुभवों के आधार पर गढ़ी गई परिकल्पना है। मतलब यह - जीतने जीव, उनकी चेतना द्वारा सीमा बद्ध उतने ही संसार। जो सापेक्ष हो वह मिथ्या ही तो होगा।  ईश्वर फिर कहाँ है ?  वह तो सर्व व्यापी है। हम सभी उसी में तो समाहित हैं।  तो यह मेरा तेरा कहाँ से आ गया?  वो ऐसे कि, लहरें सागर में पैदा होती हैं, एक दूसरे से होड़ करती हैं। गरजती हैं, उफनती हैं, किनारे आकर, तट से टकरा कर फिर सागर में विलीन हो जाती हैं। लहरें हर समय सागर में ही थीं, हर समय सागर ही थीं। बात दीगर है, कि उन्हे सागर से इतर अपने वजूद पर गुमान था।  ईश्वर क्या दुनिया चलाता है? विलकुल नहीं। गीता के अध्याय 5 के श्लोक 14 में साफ और स्पष्ट बताया गया है ...

संसार

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 सामर्थ्य मनुज की जब थक जाती, ढूँढता है तब  ईश्वर को, जिसने रचा यह संसार,  संसार में रचे प्रपंच  याद आती है, बातें पुरानी,  गाँव के टीले  पर बैठा, फक्कड़ मलंग और उसकी तान  सोने की नगरिया में माया की अँधेरीया  जब जन्मे थे, तो न कोई अपना था  न पराया था।  समय के साथ समझ बढ़ी  अहं बढ़ा, रच डाला अपना संसार     मन बावला समझता  नहीं,  प्रपंच के बीज से  प्रपंच ही तो फलेगा।  भगवान क्या करेगा।  कबीर कहते कहते चले गए  बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।     हाय रे मन,  गिरता है उठता है  फिर दौड़ता है,  जब थकता है, फिर ढूँढता है, ईश्वर को,  जिसने रचा संसार , संसार में रचे प्रपंच।