बूढ़ी आँखों के आँसू
कुछ लम्हे यदाश्त में यूं चस्पा हो जाते हैं, कि छूटते ही नहीं। बात दीगर है, कि उनके मायने बहुत बाद में, अनुभव बढ़ने पर समझ आते हैं। मन, उस पल को सहेज कर बार बार जीता है।
सन १९७५ की गर्मियों में, एक शादी के सिलसिले में अपने ननिहाल चितबड़ा गाँव गया था। उस साल मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। बचपन में ननिहाल जाने का मतलब - "आजादी" - पूर्ण स्वराज। माँ अपने मायके में अनुभव बांटने में व्यस्त, पिताजी, ससुराल में होने के कारण सौम्यता के मूर्तिमान स्वरूप। बच्चे अपने हम उम्रों के साथ धींगा मस्ती को स्वतंत्र। यही तो था - पूर्ण स्वराज - कभी खेत में, कभी नदी में, कभी भैस की पीठ पर। जब भी, जो भी...
लव भैया मेरे मौसेरे भाई, मेरी दुनिया के गाइड उन दिनों दसवीं में होंगे। मौसी की शादी भागलपुर के तरफ हुई थी, जबकि, लव भैया की बुआ पास में ही उसरौली गाँव में ब्याही थी।
एक दिन लव भैया के साथ उसरौली जाने का कार्यक्रम बना। सुबह मुँह हाथ धोकर कुछ खाकर, हम दोनों उसरौली के लिए निकल पड़े। जाने का रास्ता सीधा है - चितबड़ा गाँव बाजार, फिर रेल गुमटी और, गाजीपुर बलिया रोड पार करके बरैया के पोखरा पर विश्राम। एक आधा घंटा पोखरा की लाल और हरी मछलियों को चारा खिलाना, पोखरा की चौहद्दी नापना और, दुतल्ला पर खड़े हो कर चारों ओर देखकर अपने बड़े होने का आभास करना।
उस दिन काले काले मेघों में पोखरा, अलौकिक लग रहा था।
आगे करीब ४-५ किलोमीटर चल कर हम दोनों उसरौली गाँव पहुँच गए। फूफा जी पटना गए हुए थे। इस लिए घर बंद था। उन दिनों मोबाईल आदि तो थे नहीं, कोई भी कभी भी कहीं भी प्रकट हो जाता था। जिसके यहाँ गए वह मिला तो ठीक नहीं, तो और कहीं सही। हमारा भी तो कोई उद्देश्य था नहीं, इसलिए हम फूफा जी के छोटे भाई साहब के घर पहुँच लिए।
दरवाजा हल्का भिड़ा हुआ था। इसलिए हम घर में दाखिल हो गए। घर में सन्नाटा पसरा था। फूफी लव भैया को देख कर पहचान गईं। डबडबाई आँखों से हमारा स्वागत किया। और बोली, आज ही अठ बजिया से बहुरिया कुशल बो, धिया पूता ले के चल गई। कुशल रुकने वाले थे। लेकिन एक न मानी, स्कूल खुलने का बहाना बताकर चल दी । बच्चों के चले जाने से ,घर सन्नाटे से साये साये कर रहा है। लोर हैं कि, रुकते ही नहीं हैं।
हम असमंजस में थे कि क्या करें। खैर कुछ देर में प्रकृतिस्थ हो, हाल चाल पूछने लगीं। हमारे उपर उनका ममत्व उमड़ पड़ा। और, सिलसिला चूड़ा दही, दाल भात चोखा अचार तक पहुँच गया। फूफी और हम दोनों, इतने मगन हो गए, जैसे, न जाने कब के जानते हों।
कुछ देर के बाद उन्होंने किसी कारिंदे को बुला हमें आम के बगीचे में भेजा। तब तक बूँदा बाँदी शुरू हो गई थी। अपने होश में पहली बार हमने दसहरी आमों का बगीचा देखा था। छोटे पेड़, जमीन पर लोटते आम। खटिया पर बैठ कर हाथ बढ़ा कर आम तोड़ने का आनंद स्वर्गिक होता है। बारिश में भीगते हुए जिसने दसहरी आम न खाए हों, वह उस आनंद को तौल ही नहीं सकेगा।
शाम ढले हम दोनों वापस चितबड़ा गाँव आ गए।
आज याद करता हूँ, क्या हुआ था उस दिन। पीढ़ियों के संघर्ष में फँसी फूफी को भावनाओं के भँवर से हमारे अप्रत्याशित आगमन नें उबार लिया।
सोचता हूँ समझ नहीं पाता हूँ - क्या सब कुछ यूं ही होता है, या पूर्व नियोजित होता है।
इसीलिए उपर वाले को पालनहार कहते हैं, कहीं से कहीं, किसी से किसी को मिलाता रहता है। क्यों - ये तो वो ही जाने।
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