राज ज्योतिषी -३ (अंतिम भाग)
गंगा घाट पर आरती हो चुकी थी। गंगा शांत लहरों में बह रही थी, जैसे वाराणसी से आगे गंगा सागर तक की यात्रा की तैयारी कर चुकी हो। संध्या अब रात्रि में परिवर्तित हो रही थी। चंद्र किरणे गंगा की लहरों पर अठखेलियाँ कर रहीं थी। घाट की भीड़ कम हो चली थी।
आचार्य महेंद्र मिश्र गंगा घाट के तट पर अवस्थित हवेली के दालान में अपने आसन पर बैठ रामायण पढ़ रहे थे। उनकी दिनचर्या रामायण से ही समाप्त होती थी।
आज एक चौपाई जैसे मन में ही अटक गई -
"सुनहु भरत भावी प्रबल , बिलख कहेउ मुनिहु नाथ
हानि लाभ जीवन मरण ,यश अपयश विधि हाथ।"
भावी और भवितव्य से उनका भी तो कभी पाला पड़ा था।
विश्व विद्यालय से शास्त्री की परीक्षा पास करने के बाद, महेंद्र मिश्र, संकट मोचन मंदिर के मुख्य पुरोहित के शिष्यत्व में ज्योतिष विद्या का व्यवहारिक ज्ञान अर्जित करने में लग गए।
सहूलियत के हिसाब से, उन्हें एक ठौर मिली गंगा किनारे एक पुरानी हवेली में। महेंद्र मिश्र , गांगुली महाशय के किरायेदार हुए। वृद्धावस्था में सहारे के लिए गांगुली महोदय की वित्तीय जरूरतों की पूर्ति हुई। गांगुली महाशय, प्रवासी बंगालियों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे, जो बंगाल से अपने संबंध त्याग कर काशी के ही हो गए। अब अपनी पुत्री कुमुद के साथ निपट अकेले रहते थे।
मिश्र जी के जिम्मे गंगा किनारे का कमरा आया। अपने आप को उसी में समेट कर रखते थे। समय पर किराया चुका देते थे।
जबसे काशी के निवासी हुए, बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से, गंगा मैया की छाया में महेंद्र मिश्र तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ते चले गए। अल्प आयु में ही, वे अब काशी महाराज के राज ज्योतिषी नियुक्त हुए। राम नगर का किला गंगा के उस पार ही तो था।
कहते हैं, ज्योतिष विज्ञान में खुद के भाग्य बाँचने की मनाही है, जैसे एक सर्जन अपने आत्मीय का ऑपरेशन नहीं करता है।
सफलता की ऊंचाइयों पर निषेध आज्ञा टूटती ही है।
जब पारंगत हुए, तो एक दिन अपना ही हाथ देख बैठे। ठिठक गए, महेंद्र।।।
तीन बार देखा, चार बार देखा -
१. पत्नी दुश्चरित्र होगी और उन्हे त्याग देगी
२. जातक माता की मृत्यु का कारण बनेगा। माता की मृत्यु जल समाधि से होगी।
३. जातक प्रकांड विद्वान होगा।
उस रात बहुत देर तक महेंद्र जागे रहे। सोचा, दिए की लौ में हाथ ही जला दें,
फिर स्वस्थ होने पर सोचा - मैं शादी ही न करूंगा और माता को कभी जल के पास लेकर नहीं जाऊंगा
महेंद्र मिश्र दिनचर्या - ज्ञानार्जन व अर्थ उपार्जन में जुट गए।
कुमुद को दूर से देखा था। दोनों के बीच कोई सरोकार न बन सका था । समय के साथ दोनों में औपचारिकताएं जरूर कम हुईं।
एक रात कुमुद बदहवास भागी हुई आई। वह मिश्र के कमरे की कुंडी खटखटा रही थी। उसने महेंद्र को साथ आने को कहा। गांगुली महोदय की साँसे उखड़ रही थीं। उन्होंने जाते जाते मिश्र जी पर कुमुद की जिम्मेदारी सौंप दी। उसका हाथ महेंद्र के हाथ में दे दिया।
न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ा। कुछ दिनों के बाद मिश्र जी नें कुमुद को अपना लिया। जिंदगी बढ़ चली। महेंद्र और कुमुद गाँव जा कर माँ का आशीर्वाद ले आए। महेंद्र की माँ ने भी कुमुद को स्वीकार कर लिया।
हवेली के अन्य हिस्से में रहने वाले परिवारों में कुमुद का पहले से आना जाना था। मिश्र जी को यह अच्छा न लगता था, कि कुमुद पड़ोस के विनय से बात करे।
उन्होंने दीवार चुनवा कर अपना हिस्सा अलग कर लिया। संदेह का कोई इलाज तो होता नहीं है। एहतियातन, जाते समय मिश्र जी बाहर से ताला लगा कर जाने लगे।
कुमुद का दम घुटने लगा था। वह जितना हो सका, पत्नी धर्म निभाती रही। मिश्र जी संदेहवश अनमने ही रहते थे। साथ रहते हुए भी दोनों एकात्म न हो सके थे। एक शाम कुमुद नें विनय से कुछ किराने का समान मंगाया था। विनय खिड़की से कुमुद को जब समान दे रहा था, मिश्र जी पहुँच गए। इतने दिनों से जैसे तैसे संचित, उनका गुस्सा फुट पड़ा।
उस रात कुमुद बहुत देर तक सुबकती रही। सुबह मिश्रजी की आँख देर से खुली। सिरहाने रखा पत्र, उन्हे हवेली का स्वामित्व सौंपते हुए, उनकी अर्धांगिनी से संबंध विच्छेद सूचित कर रहा था। जाते हुए भी कुमुद घर को व्यवस्थित करके गई थी।
राज ज्योतिषी की प्रथम भविष्यवाणी सफल हुई थी। गंगा अपनी धीर गंभीर चाल से बह रही थी।
पुत्र के नीड़ उजड़ने का समाचार, माता को गाँव में रोक न सका। दौड़ी चली आईं। मिश्र जी का दुख, ममतामयी माँ के मातृत्व नें कुछ हद तक कम कर दिया था। जीवन चल पड़ा।
अगली कार्तिक पूर्णिमा के दिन माता नें जिद्द पकड़ ली। गंगा के इतने करीब हो कर भी नहा नहीं सकती हूँ, महेंद्र की यह कैसी प्रतिज्ञा है।
महेंद्र, मातृ हठ के आगे विवश हुए। उन्होंने माता को हिदायत दी - वो स्नान करेंगी, गंगा की सीढ़ियों पर, एक हाथ से धोती पकड़ कर, जिसका एक सिरा महेंद्र के हाथ में होगा।
माता बहुत प्रसन्न थीं। महेंद्र को आशीष देती गंगा स्नान को चल पड़ीं। सब कुछ ठीक ही तो था, तभी भीड़ का एक रेला आया और माता के हाथ से धोती का सिरा छूट गया। गंगा मैया तो जैसे तैयार ही बैठी थी। खुद में समाहित कर माता को काशी वास का पुण्य दिला गईं।
राज ज्योतिषी की दूसरी भविष्य वाणी भी सच हुई।
महेंद्र मिश्र संसार से विमुख हो गए। विद्वत्ता किस काम की।
मणिकर्णिका घाट पर बैठ निर्निमेष जलती चिताओं को देखते रहते। कहते हैं, वैराग्य की पुण्यस्थली मणिकर्णिका घाट ही है।
महेंद्र मिश्र का मानना है, एक दिन, महादेव ही साधु वेश धर उन्हे जीवन का मर्म समझा गए - भावी अटल है, लेकिन कर्म सर्वोपरि है।
"कर्म प्रधान विश्व करि राखा... " जैसे भवितव्य की नदी में तैरती भाग्य की नाव, नाविक के पतवार चलाने या न चलाने से तेज या धीरे चलेगी। चाहे तो नाविक भवितव्य के उलट भी पतवार के दम पर चल सकता है।
महेंद्र मिश्र जैसे नींद से जागे। कुमुद के जाने या माता के मृत्यु में कहीं न कहीं वे खुद भी तो अपनी भविष्य वाणी के सच होने हेतु जिम्मेदार थे- अपने कर्मों के द्वारा।
वो दिन और आज का दिन, महेंद्र मिश्र ज्योतिष से उपर उठ वेदान्त में चल पड़े हैं। वेद पाठशाला में वेदों की शिक्षा का प्रचार प्रसार ही उनके जीवन का संबल है।
इति- राज ज्योतिषी भाग -३
कथा समाप्त
अंत में आप सभी के उत्साह वर्धन का धन्यवाद। (कथानक पूर्व में देखी किसी फिल्म से प्रेरित है)
आपके कमेंट्स का इंतजार है।

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