संसार
सामर्थ्य मनुज की जब थक जाती,
ढूँढता है तब ईश्वर को,
जिसने रचा यह संसार,
संसार में रचे प्रपंच
याद आती है, बातें पुरानी,
गाँव के टीले
पर बैठा, फक्कड़ मलंग
और उसकी तान
सोने की नगरिया में माया की अँधेरीया
जब जन्मे थे, तो न कोई अपना था
न पराया था।
समय के साथ समझ बढ़ी
अहं बढ़ा, रच डाला अपना संसार
मन बावला समझता नहीं,
प्रपंच के बीज से प्रपंच ही तो फलेगा।
भगवान क्या करेगा।
कबीर कहते कहते चले गए
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।
हाय रे मन,
गिरता है उठता है फिर दौड़ता है,
जब थकता है, फिर ढूँढता है, ईश्वर को,
जिसने रचा संसार , संसार में रचे प्रपंच।

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