ईश्वर को जिम्मेदारी से मुक्त करें.

 एक प्रश्न चिरंतन है- संसार की रचना किसने की?

अभी समझ आया है- किसी ने नहीं। 

तो, हम अस्तित्व में कैसे आए ? 

अभी समझ आया - ईश्वर नें अपने आप को जड़ और चेतन दोनों रूपों में प्रकट करता है। 

The universe is expression of the God.


अगला प्रश्न - तो ज्ञानी, जगत मिथ्या है, ऐसा क्यों कहते हैं? 

उत्तर होगा - क्योंकि, संसार वस्तुतः व्यक्ति विशेष की चेतना और अनुभवों के आधार पर गढ़ी गई परिकल्पना है। मतलब यह - जीतने जीव, उनकी चेतना द्वारा सीमा बद्ध उतने ही संसार। जो सापेक्ष हो वह मिथ्या ही तो होगा। 


ईश्वर फिर कहाँ है ? 

वह तो सर्व व्यापी है। हम सभी उसी में तो समाहित हैं। 


तो यह मेरा तेरा कहाँ से आ गया? 

वो ऐसे कि, लहरें सागर में पैदा होती हैं, एक दूसरे से होड़ करती हैं। गरजती हैं, उफनती हैं, किनारे आकर, तट से टकरा कर फिर सागर में विलीन हो जाती हैं। लहरें हर समय सागर में ही थीं, हर समय सागर ही थीं। बात दीगर है, कि उन्हे सागर से इतर अपने वजूद पर गुमान था। 


ईश्वर क्या दुनिया चलाता है?

विलकुल नहीं। गीता के अध्याय 5 के श्लोक 14 में साफ और स्पष्ट बताया गया है -

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: |

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥14॥ 

ईश्वर न तो कर्ता है, न ही कर्म के संयोग रचता है, न कर्म फल ही देता है, यह सभी प्रकृति के बसी भूत चलते हैं। 


लहरों के कृत्य के लिए सागर जिम्मेदार नहीं। 


अतः हमें अपने कर्म व कर्मफल दोनों की जिम्मेदारी से ईश्वर को मुक्त करना है। यही संसार का मूल है।




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