इसने सब देखा है ..

 

मकान से घर बनने के सफर में,

चीजें जमा करता ही गया . 

किताबें, कपड़े, खिलौने, बरतन..  

उनके साथ जुड़ गई यादें। 

यादों  के धागे से बुनता  गया अतीत।


अरसे बाद, जब भी आता हूँ ,

बेहिसाब, खुश होता है, 

साफ सफाई के बाद, तसल्ली से, 

यादों का पिटारा खोलता है, 

जैसे, माँ अपने पुराने बक्से खोला करती थी, 

बच्चे, उत्सुक दीद, हतप्रभ बैठे रहते थे।  


इसने सब देखा है, 

नई बहु के आने की खुशी,

हमारी, नई नौकरी, नया शहर, 

नया परिवार, नया मकान, 

दर ब दर यायावर, 

 हमारा  बुजुर्गों में तब्दील होना 


इसने सब देखा है

माता पिता का अंतिम संस्कार 

 हमारा इंतजार करते, उनकी बेचैनीयां,

उनकी चिंता, कि बच्चे उनके जीवन की साँझ 

यहीं बिताएगे न ?


किसे पता कि एक बार जो गया 

मुश्किल से लौटता है 

कुछ अपना करने की चाहत में 

कितने मकान और बना लेता है। 


पुराना घर, राह तकता  है 

हमारे बच्चों के वापस  आने का 

अपने जर्जर होते वजूद से 

उनके लिए कुछ यादें, कुछ  आवाजें 

सँजो कर रखने का। 


कौन जाने, 

उन बच्चों की साँझ कहीं और ढले 

वो आयें, न आयें 

आ भी सकें, या न सकें 


यह घर इंतजार करेगा 

करता ही रहेगा 

टूट कर बिखरने तक 

बाट जोहता रहेगा.. 



टिप्पणियाँ

  1. प्रणाम सर,
    आपने जीवन का सार चंद शब्दों में बयां किया है। यही वास्तविकता है।
    💐💐💐💐💐💐💐

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रणाम सर !
    सजीव चित्रण के लिए एवं लगभग हम सभी के मन की भावनाओं को कलमबद्ध कर उन क्षणों को जीने का अवसर प्रदान करने के लिए आभार, प्रणाम एवं साधुवाद ।(गिरीश कुमार वैष्णव, आई.आई.सी.एम)

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. कौन जाने,

    उन बच्चों की साँझ कहीं और ढले

    वो आयें, न आयें

    आ भी सकें, या न सकें
    यह घर इंतजार करेगा

    लाजवाब पंक्तियाँ, मन को छू गई।

    जवाब देंहटाएं
  5. धन्यवाद, इस विधा में आपके मार्गदर्शन की अपेक्षा है।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Spence's Hotel - (Calcutta 1931)

राज ज्योतिषी -३ (अंतिम भाग)

साथ चले