" राह तकत अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 5 राज दुलारी से दुलारी दादी तक"
राम दहीन द्वारा लोचन मिश्र का समाचार मिलने के बाद जैसे राज दुलारी को काठ मार गया। घर के सभी काम तो करतीं थीं लेकिन यंत्र वत। बहु की हालत देख कर कैलाश मिश्र और उनकी पत्नी लोचन को कोसते रहते।
कैलाश मिश्र टूट चुके थे। मंत्र अब बेमानी लगते थे। किसी तरह पुरोहिताई निभा देते थे। फुलेश्वर मिश्र अभी छोटे थे। बाबूजी के साथ जजमान के यहाँ जाकर संवयस्क बालकों में खेलने लगते। जीमावन के समय प्रकट हो पूड़ी दही खाकर तृप्त हो आते। बेशक, पढ़ाई लिखाई में अव्वल आते थे।
गाँव वाले सोहारी से मुक्ति दिलाने में लोचन के योगदान को भूले नहीं थे। हर घर नें जैसे इस घर की जरूरतों को बाँट लिया था। जीवन यापन की सभी सामग्री सब जुटा देते। बूचन काका मुसलमान थे - उन्होंने अपने योगदान स्वरूप कैलाश मिश्र और उनके परिवार के कपड़े आजीवन सील कर अपनी हिस्सेदारी निभाई।
सोहारी जाते जाते पूरे गाँव को एक कर चुका था। संभवतः इस लिए भी, पीढ़ी दर पीढ़ी सोहारी की हत्या और गाँव की एका की कहानी जीवित रही। इस कहानी को बड़े नहीं कहते थे। इसे किशोर वय के युवक मेरे जैसे शहरी बालक को गाँव की महानता में दीक्षित करने हेतु बताया करते थे।
समय अपनी चाल चलता रहा।
इस बीच दुलारी भी अपने को सहेज चुकी थी। अब मनीहारिन के आने पर उत्साहित हो कर लाल सुनहरी चूड़ियों को नहीं निहारती थी। सासु माँ के समझाने पर कभी एकाध सादी चूड़ी पहिन लेती थी।
एक दिन सन 1920 की सर्दियों में किशोर वय फुलेश्वर मिश्र का अभिभावकत्व दुलारी के हाथों सौप कर सासु माँ स्वर्ग वासी हुईं।
कैलाश मिश्र हर फैसले अब दुलारी की हामी से करते। फुलेश्वर अब पढ़ाई में जुट गए थे।
गांधी जी 1915 से ही हिंदुस्तान आ चुके थे।
फुलेश्वर सत्याग्रही होने की दिशा में अग्रसर हुए। दुलारी की नजरों नें भांप लिया था - अब फुलेश्वर को खूँटे से नहीं बांधा तो ये अब गांधी बाबा के साथ चल पड़ेंगे।
1925 आते आते , दुलारी और कैलाश मिश्र नें फुलेश्वर की दुल्हिन लाने को सोचा। उनकी शादी गहमर गाँव में हुई।
एक बार फिर इस घर में रून झुन - रून झुन का संगीत बजा।
फुलेश्वर गाँव के पास मठिया में बच्चों को इकट्ठा कर अक्षर ज्ञान से प्राइमेरी तक की शिक्षा देना शुरू किए। जो कुछ फीस स्वरूप बच्चे लेकर आते, उससे फुलेश्वर का काम चल जाता। साथ ही अपने खेत जमीन भी देख लेते थे।
सत्याग्रही बनने का चस्का लग चुका था। गाहे ब गाहे जेल हो आते। जवार भर के लोग जानते थे। लाठी चार्ज से पहिले ही सीपाही उनको अलग कर लेते थे। जेल भरो गाड़ी में बैठा लेते और एकाध हफ्ते कभी बलिया तो कभी गाजीपुर की जेल में बंद कर देते।
दुलारी घर के बाहर तो नहीं निकलती थीं। पर फुलेश्वर से पूरा हिसाब समझती थीं। फुलेश्वर की पत्नी रामरती उनको ही सास मान कर पुर्ण सम्मान देती।
अब खेत रेहन से निकल चुके। मठिया का विद्यालय इंटर तक हो गया था।
अंग्रेज जा चुके। भारत आजाद हो चुका था। अमवा गाँव अब जहूराबाद कन्स्टिचूअन्सी में आ गया था। समृद्धि झलकने लगी थी।
हाँ, इस बीच संभवतः लोचन के पलायन के बाद अमवा के डीह बाबा सतर्क हो गए थे - नवहों को गाँव के आकर्षण में बांध कर रखते थे । और अब गाँव में ही खाने पीने की कमी नहीं थी, इस लिए अब कोई कलकत्ता नहीं जाता था।
फुलेश्वर और रामरती हुए मेरे दादा और आजी। मेरे पिताजी श्री राजकुमार मिश्र (जिन्हे अब हम शहरी बच्चे पापा कहते थे), पहले बक्सर में पोस्ट ऑफिस फिर पटना में बैंक की नौकरी में लगे।
लोचन मिश्र ,अब गाँव के लिए बिसर चुके थे। कैलाश मिश्र भी बहु दुलारी को अशीसते हुए जा चुके थे।
मैंने अक्सर दुलारी दादी को देखा है, शिवाला में शंकर जी की पिंडियों के सामने अनवरत बैठे हुए। ये पिंडियाँ लोचन ददरी मेले ले लौटते समय कहीं से उठा लाए थे और नीम के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिए थे। दुलारी दादी को शिवाला में एकांत और संभवतः लोचन की यादों का साहचर्य मिलता था।
दादी जाते जाते, शिवाला में शिव मंदिर स्थापना कर, हम सभी को गाँव से जोड़ कर चली गईं। आज भी जब गाँव आता हूँ, शिवाला में मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ घंटों दुलारी दादी की यादों में खोया बच्चा बन उस समय में जीता हूँ, जो दादी के साथ बिताए थे।
मैंने देखा है, दुलारी दादी को हमेशा सफेद साड़ी में। लेकिन, हर दिन स्नान कर जब वो मांग सिंदूर लगाती थी, एक लोनाई चेहरे को छूती गुजर जाती थी।
उन्होंने अपना दूख कभी सांझा नहीं किया।
अब आधी उम्र पार कर चुकने पर, जब दुलारी दादी नहीं रहीं तब समझ पाया हूँ मर्म उस गीत का जो दुलारी दादी अकेले एकांत में जाता चक्की पीसते गाती थीं -
"खेलत रही हम सुपली दऊरीया से कर लईल हमर व्याह रे बिदेशीया।
गवना करा के पिया घर बइठवले कीअपने वसेला परदेश रे बिदेशीया!
दिनवा गिनत मोरा अंगुरी खिआई गईले, बिहरा में कटे मोर रात रे बिदेशीया"
इति भाग 5

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