" राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया" अथ भाग 4 "फिजिया के टपुआ में रूपिया ही रूपिया , बैठले जहाजवा में किस्मत बिदेसिया"

 नई दुल्हन के आने से  पुरा घर संगीत मय हो जाता है, कभी पायल की रूनझुन, तो कभी चूड़ियों की खनखन।


लोचन और राज दुलारी की आपस में बात ज्यादा नहीं होती थी। खाना देते समय, पीढ़े पर बैठे लोचन और दरवाजे की आड़ में बैठी दुलारी आपस में कनखियों से एक दूसरे को देख लेते। नजर मिल जाने पर नवोढ़ा दुल्हन, शर्म से छुई मुई हुई जाती थी। लोचन के घर पर रहने के समय, दुलारी और भी भरी पूरी महसूस करती थी। पायल और चूड़ी उस समय कुछ ज्यादा ही बजती थी।

सासु माँ , सब कुछ समझ गुन कर अनजान बनी, पड़ोसन के घर जाने का कह, ऐसे मौकों पर निकल जाती।

दिन  अच्छे कट रहे थे।

उन दिनों लड़की का विवाह पछिम करने की प्रथा के कारण, दुलारी के मैके के आस पास की कई लड़कियां, इस गाँव में ब्याही थीं । अब वे दुलारी से मिलने आने लगीं । अंधेरा ढले या पौ फटने से पहले घर से बाहर जाने वाली टोली में अब दुलारी भी शामिल हो गई। भर रास्ते , आपस में  हँसती बतियाती एक दूसरे का भेद भी सांझा करतीं। ससुराल के कष्ट और यहाँ जीने के तरीके भी समझाती।

ऐसे ही एक दिन बतकही निकल गई - इस गाँव के मर्दों पर। कंचन बो ने बात छेड़ी - बलिया जिला के नवहा अपने आगे किसी को गुनते नहीं हैं, किसी से दबते नहीं है। जबकि इस गाँव में जमींदार जब गाजीपुर से आता है, तो मुआ अपना एक पैर हल्का बाहर निकाले रहता है। हमारे मर्द लोग, उसके पैरों को देख कर ही मगन रहते हैं। कहते हैं - कैसा माखन जैसा पैर है, लाल लाल तलवा है। एक दो तो, मौका पाते ही  पैर भी छु लेते हैं। बलिया में ऐसा नहीं होता है। लाट साहब भी आ जाए तो भी बलिया वाले न झुकें।    सभी सखियाँ ठी ठी करके हँस  दी। शाम गुलजार हो गई थी।

(1879 में बना बलिया जिला अभी भविष्य में बागी बलिया  बनने की राह पर था और ऑक्सफोर्ड डिक्शनेरी में बलियाटिक शब्द शुमार किया जाने वाला था)

सब समय एक समान नहीं होता। इस गाँव में भी समय बदल।

सन 1913 का अकाल सब कुछ लील गया। ग्रामीण पशुधन और जर जमीन से मुहाल हुए। कैलाश मिश्र का भी आधा खेत रेहन पर चढ़ गया।

लोचन के मन मस्तिष्क पर अब जिम्मेदारी का अहसास घर कर रहा था। क्या करें कैसे करें इस ऊहापोह में दुआर पर लेटे रहते।

तभी जमींदार के लंबरदार शंभू सोहारी का खेमा गाँव की अमराई में लगा। बकाया लगान वसूली का समय था। दिन भर घर घर जा कर कारिंदे जोर जबरदस्ती करते। कमजोरों को मारते पीटते । पूरे गाँव में कोहराम मचा रहता था।

लेकिन शाम होते ही अमराई में पेट्रोमैक्स की रोशनी में स्वर्ग उतर जाता। सोहारी की रातें मौज मजे में ठहाकों के साथ बीतती थीं । हर कोई मनाता - कब जाएगा यह शंभू सोहारी  ( उसका नाम शंभू सोहारी ही इसी लिए पड़ा था, कि वह हर समय सोहारी ( पूड़ी / सोहारी )ही खाता था, जबकि गाँव वालों के लिए चावल ( माड़ भात) तो दूर अब, सावा पर फाका करने की मुसीबत थी।

जैसे जैसे दिन बढ़े, सोहारी का अत्याचार बढ़ने लगा अब, एकाध बार बहु बेटियों की भी धमकी दे चुका था। गाँव के नवहे गरम तो होते थे पर, बुजुर्गों की नसीहत पर हाथ मलते रह जाते थे।

एक दिन रात को सोहारी की अमराई में बहुत नाच गाना हुआ, पता चला किसी उम्दा नचनिया को बनारस से मंगाया था।
उसके बिहाने भइले ही ऊख के खेत में शंभू सोहारी औंधे मुंह मरा पड़ा था। शरीर पर कहीं भी चोट के निशान नहीं थे। केवल आँखें कुछ ज्यादा बाहर निकली हुई थी।

गाँव के लोग अपनी दिनचर्या में इस तरह लगे रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। ऊख के खेत में सोहारी के गुर्गों की भीड़ और उसके बाद उन्मे खलबली होने पर भी किसी ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई।

बीती रात लोचन बहुत अंधेरे लौटे थे, उन्होंने खाना भी नहीं खाया था और ओसारे में सो गए थे। दुनिया से छुप सकते थे पर कैलाश  मिश्र और दुलारी से नहीं। आशंका को और सवाल पूछ कर गहरा करने से अच्छा उसे दफन करना ही श्रेयस्कर होता है। इस लिए पिता और पत्नी नें कोई सवाल नहीं किया।

सोहारी का खेमा उठ गया। मोहम्मदाबाद से अंग्रेज दरोगा के आने तक गाँव के बुजुर्ग एका कर चुके थे। दरोगा, गाँव के बाहर इनार पर अपना आसन लगा कर बैठ गया। ग्रामीणों को बुलाया गया। किसी नें चू तक नहीं की। सभी ग्रामीण बुत बने खड़े रहे। दरोगा खिसिया कर बोला - क्या इस गाँव में प्लैग आ गया था, जो किसी ने कुछ नहीं देखा। सरेआम एक आदमी की हत्या हो गई और किसी ने कुछ नहीं सुना न देखा एक एक को अंदर कर दूंगा पूरे गाँव को तबाह कर दूंगा।  लाश और जमीन की शिनाख्त बताती है - इसकी हत्या  दम घोंट कर की गई  है । अभी भी समय है सच बोलो।

एक चुप हजार चुप। खीजता हुआ दरोगा चल गया। पूरे गाँव पर सामूहिक जुर्माना लगा। बिना सबूत बिना गवाह केस बनाने की कला अंग्रेज पुलिस ने अभी नहीं सीखा था ।

जुर्माना भर कर गाँव उऋण हो गया। बाहर का कोई न जान पाया। लेकिन अब अठगावां में अमवा के सेंगर राजपूतों का नाम हो गया। नाथ बाबा के मंदिर पर अब उन्हे बाकि गावों  के  मुकाबले पूजा में प्राथमिकता हो गई।

कैलाश मिश्र अब सशंकित रहने लगे थे। जैसे तैसे अमहट के राम दहीन यादव के साथ लोचन मिश्र को कलकत्ता रवाना किया। कैलाश मिश्र क्या जानते थे वो लोचन को देश निकाला ही दे रहें हैं।

दुलारी के सामने निर्णय मानने का कोई विकल्प नहीं था, तो भी अंदर से वह डरती थी, सुना था कि, बंगाल में जाने वाले पुरुषों को वहाँ  पल्लू से बांध कर भेड़ा  बना कर रख लेती हैं।

करीब छह माह बाद राम दहीन   एक दिन घर आए - उन्होंने बताया , कलकत्ते में लोचन का मन मजदूरी में लगता नहीं था। आखिर संस्कार तो खीचते हैं। वेद पाठी पिता का पुत्र मजदूरी कैसे करे । जब तब लोचन मिश्र बाबू घाट पर बैठे हुए हुगली की धार देखते रहते। एक दिन वहीं घूमते एंड्रूस कंपनी के अजेंटों से मिल गए। सोचा, पाँच साल के लिए गिरमिटिया बन जाएं और पैसे कमा कर दुलारी के पास लौट जाएं।

गिरमिटिया बनकर कहीं फ़िजी जाने का जिक्र हो रहा था, पानी के जहाज से।

पाँच साल बाद ही सही, दुलारी से मिलने के सपने में इतना दम था, कि एक अनजान भविष्य से लोहा लेने चल दिए।

तपाकी तो लोचन शुरू से ही थे, इस बार लंबी छलांग लगा चुके थे।

"फिजिया के टपुआ में रूपिया ही रूपिया , बैठले जहाजवा में किस्मत बिदेसिया"

इति भाग 4 



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