राज ज्योतिषी - भाग -2

वसंत पंचमी की सुबह, महेंद्र मिश्र की वेद पाठशाला में चहल पहल थी। आज से नए वेद पाठी छात्र, माता सरस्वती की उपासना कर वेद पाठ के  प्रथम सत्र का शुभारंभ करने वाले थे। 

अभिभावकों के साथ आए सद्यः स्नात, नवीन वेषधारी वेदपाठी प्रशिक्षु बालक सहमें बैठे हुए थे। वहीं पुराने छात्र, पीत आवरण व धोती पहन इधर से उधर व्यस्त से डोल रहे थे। उनकी एक आँख, नव छात्रों पर भी लगी थी। जब भी नव-छात्र बाल सुलभ कलरव शुरू करते, पूर्ववर्ती छात्र आँखे तरेर कर अनुशासन स्थापित करते। 

पंडित महेंद्र मिश्र नें तैयार हो, तिलक लगाते हुए, एक बार खिड़की से आँगन में झांक लिया। आँगन में सरस्वती प्रतिमा के आस पास का कोलाहल, उन्हें अनायास ही अपने बाल्य काल में लेकर चल पड़ा। जब, "वीणा वादिनी  वर दे..." का उनका  सस्वर पाठ सुधि जनों का ध्यान आकृष्ट करता था। 

स्मृतियाँ उन्हे लेकर उनके गाँव पहुँच गईं, उस वसंत पंचमी को उनके पिता कैलाश मिश्र उन्हे माता सरस्वती की महिमा समझा रहे थे। 

कैलाश मिश्र की आजीविका, पुरोहिताई से चलती थी। गाँव के मंदिर की पूजा का भी भार उनके उपर ही था। 

यजमान के घर कथा बाँचने जाते हुए पिता अपने पुत्र को  सचेत करते  थे - पुरोहिताई के धंधे में कुछ रखा नहीं है। यजमान भी अब पहले जैसे न रहे। धर्म में श्रद्धा मिट रही है। तुम मन लगा कर पढ़ो। तुम्हें काशी भेजूँगा। मैं तुम्हें शीर्ष पर देखना चाहता हूँ। 

बालक महेंद्र भी, पूजन व ब्रह्म भोज  उपरान्त, यजमानों की नई कुतर्की पीढ़ी के अनोखे सवालों पर चकित होता था।  

"पंडित जी बताएं, सत्य नारायण भगवान की पहली कथा सूत ऋषि ने सुनाई, यह तो पता चलता है, पर वास्तविक कथा थी क्या ? 

भगवान कृष्ण नें सबका संहार ही क्योंकर करा दिया। जब सभी युद्ध में मर ही गए, तो पांडव किस पर राज्य कर रहे थे ?

राम जी ने सुग्रीव की पत्नी का वरण  करने के कारण बाली को मार  डाला, पर फिर सुग्रीव नें भी तो वही किया?"

अधकचरे ज्ञान जनित कुतर्क की कोई सीमा नहीं होती है। कैलाश मिश्र इस तरह के दुरूह प्रश्नों का जबाब नहीं देते थे। पंडित जी समयोचित त्वरित बुद्धि प्रयोग से इन प्रश्नों को किनारे कर देते थे। 

"यजमान आपके कुलदीपक प्रखर प्रज्ञा वाले हैं। उनके प्रश्नों का उत्तर या तो सूत जी, या भगवान कृष्ण , या प्रभु रामचन्द्र ही दे सकते हैं। मैं एक कथा वाचक, आप सभी की मंगल कामना करता हूँ।" 

ऐसा कह, कैलाश मिश्र अपने पुत्र महेंद्र का हाथ पकड़ उठ जाते और दान दक्षिणा  समेटते हुए चल पड़ते। 

घर जाते समय, उनके मन में उत्कट संकल्प जन्म लेता था, कि महेंद्र को इस समाज से आगे लेकर जाना है। इसे धर्म धुरंधर बनना है। 

इस निमित्त, महेंद्र मिश्र की शिक्षा दीक्षा चल पड़ी। कैलाश मिश्र यह भी जानते थे, उनका शरीर अब आगे साथ नहीं दे पाएगा। अतः, उन्होंने महेंद्र की शिक्षा की रफ्तार और बढ़ा दी। 

सोलह वर्ष की आयु में महेंद्र मिश्र, सम्पूर्णानन्द  संस्कृत विश्व विद्यालय में दाखिल हुए। उसके दूसरे साल कैलाश मिश्र जैसे जिम्मेदारी से मुक्त हुए, वैसे ही संसार से भी मुक्त हो गए। गाँव  समाज नें पंडिताइन का भार अपने उपर ले लिया। 

महेंद्र मिश्र अब आगे की यात्रा हेतु निपट अकेले थे। पिता की सीख और वीणा वादिनी का आशीष ही उनका संबल था.. 

इति - राज ज्योतिषी  भाग -2 





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