भाई सहोदर कभी न मिलिहैं , चाहे कोटी करो उपाय
उम्र के उस पड़ाव पर, जब देखने को कुछ ज्यादा बचा न हो, तो मन पीछे भाग कर स्मृतियाँ जुटाता है। इसी तरह की एक डुबकी, मुझे आल्हा उदल की गाथा में ले गई।
एक डुबकी, एक न रही, मन ही दरिया हो गया।
मैं बह चला।
यू ट्यूब में आल्हा सुनता रहा। आल्हा उदल की कहानी तो पता थी। लेकिन, एक प्रसंग ऐसा मिला, जो आज की हिसाबी किताबी पीढ़ी से कहीं आगे है।
आगे बढ़ने से पहले एक प्रसंग परिचय का:
जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं. मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन 1250 में लिखा गाया था .
भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही..... लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. मतलब ये कि वह गाथा जिसे गा कर सुनाया जाये लोकगाथा कहलाती है.
"रन में दपक -दप बोले तलवार,
पनपन-पनपन तीर बोलत है,
कहकह कहे अगिनिया बाण,
कटकट मुंड गिरे धरती पर,
पुनः लौटते हैं प्रसंग पर . .
आल्हा से एक बार उदल ने जेठ के दशहरे पर गंगा स्नान के लिए जाने की अनुमति मांगी। आल्हा ने पहले मना किया फिर अनुमति दे दी। उदल के साथ उसका भतीजा इंदल भी चल पड़ा।
बिठूर में गंगा स्नान हेतु उदल का खेमा लगा। वहाँ, बलख बुखारे की राजकुमारी चित्रलेखा ने इंदल का अपहरण कर लिया। उदल को इंदल बहुत खोजने के बाद भी नहीं मिला।
इंदल अपहरण के बाद उदल जब महोबा पहुंचा , तबतक , माहिल मामा ने आल्हा के कान भर दिए - उदल ने इंदल को मार डाला है।
आल्हा कुपित होकर उदल को मृत्यु दंड दे देता है।
तभी, आल्हा की पत्नी सोनवा कुछ ऐसा कहती है, जिसे हम भूल चुके हैं
ऐसी बानी को सुन देखन, सोनवा बोले जिया उजार
अब न मारो मोरे देवर को, बालम मानो कहा हमार
जावल देवर मरी है जैहैं , तो हम करिबे कौन उपाय
भाई तुम्हें उदल न मिलीहैं , चाहे कोटी करो उपाय
हम तुम कायम हैं एही दुनिया में, लईका फिर पैदा होई जाई
भाई सहोदर कभी न मिलीहैं, चाहे कोटी करो उपाय
मतलब यह कि सहोदर भाई अमूल्य है।
आज पैतृक सम्पति के संदर्भ में, जायदाद के बँटवारे के समय हम सभी हिसाब किताब में लगे रहते हैं -
मेरा कितना ?
या फिर,
मैं ही क्यों देखूँ, क्या मेरा ही जिम्मा है. . .
जितने सहोदर उतना हिस्सा. . .
अदालतें भरी पड़ी हैं पारिवारिक मुकदमों से . . .
ऐसे में लोक काव्यों में गढ़े, सोनवा जैसे प्रसंग हमें पुनः भारतीयता के तरफ अपने संस्कारों के तरफ खिचते हैं।
ये ही हमारे जीवन मूल्य बनाते हैं। इन्हे सँजो कर रखें - राह भूलें तो पथ प्रदीप की मदद लें।
शत शत नमन. .
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