सुबह की चाय

 कोलकाता की  सुबह शुरू होती है, लगभग हर नुक्कड़ पर बनती ताजी चाय की खुश्बू से। 


सुबह की तफरी में, दिल पर काबू रखना मुश्किल होता है। न जाने कब फिसल जाए और आप डाइबीटीज और तमाम खतरे को भूल कर किसी चाय दुकान पर खड़े मिलें। 


ताजे औटे गए दूध में उबलती पत्तियाँ..  और सुबह की शीत समीर  दोनों मिलकर चित-बरबस करने को काफी हैं। 


यहाँ कुल्हड़ का प्रचलन आज भी है।  कुल्हड़ की सोंधी महक, चाय के स्वाद को और भी बढ़ाती है। 


बात छेड़ने की गर्ज से, यह पूछना आम है, " चाय कैसी है? ठीक तो बनी है।" 


एक दिन अल सुबह, सपत्नीक मैं एक नए रास्ते में टहलने गया था। 


घर लौटते हुए एक नुक्कड़ पर, चाय बनाने वाली महिला से वही सवाल पूछ बैठा - " चाय कैसी है? ठीक तो बनी है।"


महिला संभवतः बनारस की थी। मेरे लहजे को पहचान गई। 


उसने बाजी पलटी - " बाबूजी, कोई अपनी बेटी को खराब कहता है क्या? आप चाय पी कर खुद ही बताएं - कैसी बनी है।  मैं तो अपनी चाय को अच्छा ही बोलूँगी।"


बात की गहराई समझ कर पत्नी और मैं मुस्कुरा पड़े। आज की सुबह बन गई थी। 


बात दीगर है, आगे कभी मैं किसी से भी नहीं पूछता हूँ, " चाय कैसी है? ठीक तो बनी है।"




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