राज ज्योतिषी (1)
वसंत पंचमी की सुबह गंगा घाट पर थोड़ी भीड़ तो थी, पर, पंडित महेंद्र मिश्र को स्नान करने में कोई दिक्कत न हुई।
सभी
जानते थे,
सुबह सूरज उगना भूल जाए पर नियत समय पर ठीक 5 बजे, मिश्र जी जरूर नहायेंगे। नहाते समय
ठोस आवाज में जब पंडितजी स्नान मंत्र पढ़ते, तो
लगता साक्षात शंभू के दर्शन हुए।
नहाने
के बाद बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ा कर ही मिश्र जी की दिनचर्या प्रारंभ होती थी ।
अगला
कदम उदय चौरसिया की दुकान से चाय की दो प्याली के बाद पान खा कर ही उठता था।
उदय
से उनकी जान पहचान बहुत पुरानी थी। कचोड़ी गली के नुक्कड़ पर जब मिश्र जी विद्यार्थी
के तौर पर आए थे,
तब,से। उदय तब 10 साल का रहा होगा।
एक
उदय ही था जो मिश्र जी से थोड़ी ठिठोली कर सकता था।
उस
दिन दुकान पर आते ही उसने तुक्का छोड़ा, यह जानते हुए भी कि, बाबा हाथ देखने से नफरत
करते हैं ,और, वर्षों से सीखी ज्योतिष विद्या
कबके त्याग चुके हैं।
“का
बाबा,
बहुत जबरदस्त लागत हौआ,
हमार
हाथ देख के बताव त,
कब तक शनि तबाह करी। साढ़े साती खतमे नईखे होत।“
मिश्र
जी वक्र दृष्टि से देख कर कहे - हाथ की रेखा में शनि बैठा है, तुम्हारे
हाथों को तो नहीं रोक रखा है, न। कर्म पर
विश्वास करो, उदय। कर्म ही तुम्हें रास्ता देगा। धीरज रखो।
तुम्हारा
अभी का कर्म है, - चाय के एक बड़े कुल्हड़ से मेरी आत्मा को तृप्त करने का। लग जाओ उदय,
मुक्ति मिलेगी।
बाबा
विश्वनाथ की नगरी, काल भैरव की कोतवाली को, कहते हैं आशीर्वाद मिला है – यहाँ की गलियों
में वेदान्त बसता है। इसीलिए तो आदि शंकराचार्य
भी तब तक स्थापित न हुए जबतक मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ में न जीते।
यह कौतूहल का विषय रहा है, - महेंद्र मिश्र,
ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान आखिर ज्योतिष
विमुख क्यों हो गए।
साहब,
यह बनारस है, विरोधाभासों की नगरी, कभी फुरसत से बैठें तो आगे बात करेंगे।
अभी,
चलते हैं .........
इति भाग -१

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