राह तकत अँखिया सूनी रे विदेसिया (भाग-2 - ऊँघता सा मेरा गाँव जग उठा)
भाग 2
दुलारी दादी की कहानी शुरू करने से पहले, एक स्पष्टीकरण जरूरी है - दुलारी दादी ने अपनी कहानी मुझे कभी नहीं सुनाई। जब सुनाई नहीं तो मुझे कैसे पता चला?
मेरा अनुमान है, मेरी पहली यादाश्त सन 1965 की है। ऐसा इसलिए, कि एक दिन गाँव में दादी के साथ दोपहर में सोया हुआ था, कि एक बड़ा सा हेलिकाप्टर आवाज कर्ण भेदी आवाज करता उड़ता हुआ चला गया। दादी ने चौंक कर मुझे कस के पहलू में कर लिया। बाद में जाना, उस समय भारत पाकिस्तान युद्ध चल रहा था। वह मिलिटरी हेलिकाप्टर रेकी पर निकला होगा (इतिहास से तस्दीक हो गई)
सन 1965 से 1980 तक हम सभी, लगभग हर साल जाड़ों में पटना से गाँव जाते थे। अल सुबह भोजपुर शटल ट्रेन से बक्सर, फिर तांगे से उजियार घाट का पीपा पुल पर करके बलिया जिला में भरौली और फिर बस से चित बड़ा गाँव (हमारा ननिहाल)।
एक दिन ननिहाल मे रुक कर दूसरे दिन छोटी लाइन की अठ बजिया ट्रेन से ढोंढा डीह स्टेशन पहुंचते थे। आगे की यात्रा पिता जी साइकिल से और हम सभी माँ के साथ एक बैल की छकड़ा गाड़ी में। कभी जमुना तो कभी बलेसर काका छकड़ा ले कर आते थे। चकरोट के रास्ते हचर हचर , मचर मचर करते दो घंटे में गाँव पहुचते थे। गाँव की निसानी, मठिया और तीन तरकुल के पेड़ थे। लगभग एक मील से ही दीख जाते थे।
गाँव पहुंचते ही, गरम पानी की परात में पैर धोए जाते थे।
इसके बाद ही मेरा संबंध मेरे माँ और पिताजी से कट कर दुलारी दादी से जुड़ जाता था। मैं अब माँ की वक्र भृकुटियों के इशारे से डर कर सहमने वाले मुन्ना से तब्दील होकर, दुलारी दादी के पल्लू से बंध शेर हो जाता था। उनके छाँव तले अब मैं मर्जी का मालिक था। जब मन करे, जो करूँ । पटना से चलते समय लाई गईं किताबें और होम वर्क की कापियाँ जैसे अनाथ हो जाती। बक्से में बंद डहकती रहतीं थी।
पूरे प्रवास के दौरान, मेरा तय मेनू था - सुबह नाश्ते में मटर की घूघनी, दिन के खाने में चूड़ा दही , दुआर पर ऊख का रस दिन भर। इसके साथ ढूँढी, गुड़ सतू और लाई और ऊख के रस को कड़ाहे में उबाल कर गुड़ बनाते समय ताजा गुड़ का चखना। शाम को कउड़ के किनारे बैठ कर गाँव भर की बातें सुनकर, रात को मद्धिम लालटेन की रौशनी में सो जाना।
दिन में चूड़ा दही सेवन के बाद मैं दुआर पर न जा कर जनाने में ही मंडराता रहता था। मर्दों के खा लेने के बाद, घर की औरतें एक बार फिर से नहा कर तैयार होकर ओसारे में बैठती थीं ।
और, सिलसिला शुरू होता था, पिछले दरवाजे से गाँव भर की औरतों के आने का। पानी भरने वाली कमकरिन , चूड़ी पहनाने वाली मनिहारीन, पूरे जवार के समाचार के साथ तसल्ली से बैठती थीं। गाँव भर के समाचारों की पोटली खुलती थी। मुझे उनका नाम बड़ा भाता था - जैसे "सामपुर वाली, बलेसर बो, या डब्लू के माई.. अपने अस्तित्व को भूल कर मैके, पति या बेटे से जोड़ने की अजब परंपरा रही है, मेरे समाज में।
दुलारी दादी सबमें वृद्ध थीं। अतः ओरहन से लेकर, खुशी - गमी तक की सभी तरह की बातें होती थी। मेरी दादी, काकी, दीदी और भाभियाँ, कभी फुसफुसाती , कभी मुसकुराती और कभी सभी खिलखिला पड़तीं। इसके विपरीत कभी अचानक सिरियस हो जाती, कभी एक दो आँसू टपका कर रो भी लेतीं थी। बचपन से किशोरावस्था तक यही बैठक, मेरी मानव मन को समझने की प्रयोगशाला रही।
इसी प्रयोगशाला में मैं एक एक टुकड़ा जोड़ कर दुलारी दादी का इतिहास बुनता गया। सच कहूँ तो ,जब आधी उम्र बीत गई, तब ही पूरा समझ सका।
तब जब, एक दिन अचानक, सन 2000 में किसी मिसेस अरीदयाना मिसिर के फ़िजी से मेरे गाँव आने की खबर मिली..
The description reminded me the Premchandra stories we used to read in childhood wherein beautiful descriptions were made and you can visualise the actual landscape and activities depicted in the story.
जवाब देंहटाएंI could really connect to my childhood days in Ghazipur and our annual trip to Aazamgarh for going to Nanihal.
Words like Balesar Bo and Dhabbu ke Mai take me to the old days and encourage me to go back again to the same place and enjoy the freshness and peace.
Today, when i am sitting in my balcony and watching rain drops, i can really connect to the story with my childhood.
Not an expert to use hindi in mobile, so writing in english but hope you can understand my feelings and hope to read you more.
Regards
Great words. Feeling encouraged
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