साहचर्य
याद है, तुम्हारा पहला कदम
रूनझुन, रूनझुन
नूपुर बजे थे
हाथ मैंने बढ़ाया था..
उसे थाम कर
दुनिया देखा था तुमने हमने
ख्वाब बुने थे साथ साथ..
विलीन तो हम दोनों ही हुए थे
एक दूसरे में।
तुम कुछ ज्यादा, मैं कुछ कम
आशियाना बसा, फूला फला
किलकारियाँ गूंजी,
शिद्दत से जुटी रही तुम, बच्चों की तरबीयत में
बच्चे बड़े हुए
और, कुछ नया करने को
निकल पड़े, नई दुनिया में ।
अब सब चले गए..
हम तुम ही रह गए।
अब हम हैं साथ साथ
तुम्हें सीमाएं बनाने की आदत हो गई है।
और, मुझे सीमाएं लांघने की।
मसलन, चीनी कम, दवाई समय पर
भोजन सीमित, पानी ज्यादा।
समय पर सोना, समय तक सोना
अगणित, असीमित निर्देश..
आदत सी पड़ गई है,
तुम्हारे होने की,
गाड़ी चलाते समय, तुम्हारी झिड़कियों की
तुम्हारी, वक्र भृकुटी - एक नजर, सड़क पर,
दूसरी, ट्रैफिक लाइट पर, ट्रैफिक पुलिस पर
कहीं किसी को या किसी से लग न जाए।
मेरी ड्राइविंग की भूल चूक का लेख जोखा
दर्ज करता तुम्हारा मन.. निरंतर
लैपटॉप पर डूबा या टी वी में खोया मैं
चौंक पड़ता हूँ तुम्हारे आने से।।
सच में..
तू किसी रेल सी गुजरती है।
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
बात दीगर है,
पुल को आदत हो गई है, रेल के गुजरने की।
बिना रेल के, पुल भी तो बेमानी है।।

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जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
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जवाब देंहटाएंVery nice 🙏
जवाब देंहटाएंBahut khoob
जवाब देंहटाएंwah,wah..kya likhte hain aap👏👏👏
जवाब देंहटाएंNice lines 🙏😊
जवाब देंहटाएंWell said🙏
जवाब देंहटाएं👌👌👌
जवाब देंहटाएंEk mining engineer. Ek kavi. Bahti hui bhavnayen. Ek sundar sankalan.
जवाब देंहटाएंBadhaiyaan. 💐💐🙏
दाम्पत्य की बारीकियों को समेटे, सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंधन्यवाद, इस विधा में आपके प्रोत्साहन की आकांक्षा है।
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