कोलाहल



हर शहर की पहचान है,
उसका कोलाहल,
कहीं से कहीं पहुँचने
की अनवरत यात्रा,

रास्ते के राहगीर हमारे परिचित
नहीं होते
न ही उनकी यात्रा सांझा होती है,
लेकिन उनके होने से शहर जीवंत होता है।
सब ठीक होने की तसल्ली होती है।

कोलाहल थमता है
कर्फ्यू में,
जब आप बंद कर दिए जाते हैं
अपने घरों में।
कुछ तो नहीं बदलता है,
सिवाय, आपके निःशंक बाहर निकलने
के अधिकार पर लगाम के।

विगत दिनों, एक और कर्फ्यू लगा
कोरोना का ,
जब, समाचार तो आते रहे
पर, बाहर निकलने पर पाबंदी थी।
उत्सव में न सही, पर गमी में न शरीक होना खला
मृत्यु में भी दूर से देखते रहने की पाबंदी,
मजबूर कर गई

अस्तित्व का संकट
भविष्य की चिंता
अपनों के बिछड़ने का गम,
कहीं न कहीं अकेला कर गए।

मन कहाँ रुकता है,
मौका पाते ही सपने बुनता है।
बताता है, करोना जा रहा है,
भीड़ लौटेगी।
कोलाहल मचेगा,
फिर, होगी सुबह
संभावनाओं की .....



टिप्पणियाँ

  1. शानदार हकीकत बयानी, ग़ज़ब का शब्द चित्र, गोया आंखों देखा हाल और जिंदगी की जिजीविषा और आशावाद की पराकष्ठा से परिपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🌹😷

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  2. धन्यवाद, इस विधा में आपके मार्गदर्शन की आकांक्षा है।

    जवाब देंहटाएं

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