राह तकत  अंखिया सूनी रे विदेसिया

 हावड़ा स्टेशन के रास्ते जाते हुए, जब भी बड़ा बाजार इलाके से गुजरता हूँ, मन जैसे विचार शून्य हो जाता है। अल सुबह खाली होते या लोड होते ट्रक, और अति व्यस्त लोडिंग मजदूर, पुराना घाव उकेर देते हैं।


एक ही धुन गूंज पड़ती है - " राह तकत अँखिया सूनी भई, लोर गए सूख रे, बिदेसिया.. " पता नहीं क्यों दुलारी दादी सफेद साड़ी पहने, सामने खड़ी दिखती हैं।

उनकी सूनी आँखों से भागने के लिए कई बार मैंने ड्राइवर को रास्ता बदल कर इ एम बाई पास की तरफ से भी लेने को कहा है। हालांकि, अतीत से कोई भाग सका है क्या ? फिर भी..

दुलारी दादी के हाथ से इतनी बार दाना भुजा खाया है, इतनी बार उसकी छाया में सोया हूँ, कि, उसकी गंध आज भी मेरे लिए पुर सुकून इत्र है। मेरे गाँव आने से एक हफ्ते पहले ही, नए धान का चूड़ा , छान फटक कर , मोटी लाल छाली वाली दही की व्यवस्था कर इंतज़ार करती थी।

दादी मानती नहीं है। मेरे लाख समझाने  पर भी कि , आज की पीढ़ी इंटरनेट, इंस्टाग्राम वाली है, इसे विदेसिया या लोचन मिश्रा की कहानी में क्या इंटेरेस्ट होगा

सन 1980 की गर्मियों में जाते जाते भी, आँख मूदने से पहले, उसने मेरा हाथ पकड़ कर ,भर -दीद नजरों से देखा, जैसे कह रही हो, मेरा मुन्ना बताएगा मेरी पीड़ा, मेरा संघर्ष । मैं तो न कह सकी, जो कहानी, अब वो अकथ नहीं रहेगी। मेरी आत्मा तभी जुड़ाएगी।

शायद इसी लिए, स-अधिकार आ जाती है, हावड़ा से गंतव्य तक पूरे रास्ते मेरे मानस पटल पर शांति से बैठी रहती है। तसल्ली से इंतजार करती है, जैसे ओसारे में शीतल पाटी पर बैठी करती रहती थी।

इस बार बनारस जाते समय, सोच लिया, दादी की आत्मा को आजाद कर दूँ। मेरे सोचते ही, दादी मुसकुराती हुई चली गई, दिल्ली राजधानी की पटरियों पर धड़ धड़ ताल से जग उठा।  बाहर देखा, दीन दयाल नगर स्टेशन के आउटर पर ट्रेन रुक गई थी।  

इति भाग -1 





टिप्पणियाँ

  1. ग़ज़ब कर रहे हैं सर,आप तो।
    यह देखना पढ़ना हमें सुखद आश्चर्य में डाल देता है कि भागलपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम ए मैंने किया और माइनिंग इंजीनियर, टेक्नोक्रेट होने के बावजूद " गर्दा " आपने उड़ाया हुआ है।
    तब के कलकत्ता के हिंदी दैनिक " सन्मार्ग " में पत्रकारिता करते हुए मैं उसके मेट्रो देहाती मिक्स कैरेक्टर से वाकिफ था। पर, आपकी दादी की लाल मोटी छाली ने नवादा (बिहार) स्थित मेरे गांव बाजितपुर के हमारे घर में काम करने वाली दसीनिया मामा (दादी) और आरा जिला के बड़कागांव में मेरी ननिहाल में तांबा के बड़े कटोरे में लाल मोटी छाली सहित दूध (ज्यादा नही, सिर्फ़ छह लीटर) एक सांस में पीने वाले हमारे बड़े मामाजी की याद ताज़ा कर दी। (देखो,आपके बहाने मेरी बात भी मैंने कर ली)
    बतकही के आपके इस नायाब अंदाज़ ने माटी की सोंधी महक और मजबूती से हिंदी के ज़िंदा रहने की छीजती आस को बलवती कर दिया है।
    लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन पर ही सही,लेखन की यह सुखद यात्रा अनवरत जारी रखें,यही विनम्र अनुरोध है।
    आपके व्यक्तित्व के इस अनछुए पहलू को स्वांतः नहीं,बहुजन सुखाय उजागर करने के लिए हार्दिक बधाई और इन अनमोल संस्मरणों को अगली पीढ़ी तक पुस्तकाकार पहुंचाने की योजना बनाएं।इस महती प्रयास में मेरा सौ प्रतिशत योगदान मैं ऑफर करता हूं।

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  2. आपका प्रोत्साहन और सुझाव मिलता रहे।

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