राह तकत अंखिया सूनी रे विदेसिया (भाग -3 "और अजोरिया फईल गइल " )
बीसवीं सदी पूर्वार्ध (1912-13 )- गाँव अमवां, तहसील मुहम्मदाबाद गाजीपुर
करीब 50 घर की बस्ती। 34 घर राजपूत, 1 घर ब्राह्मण , बाकी अन्य ।।
लोचन मिश्र के बाबूजी श्री कैलाश मिश्र, यानि हमारे परदादा पुरोहितायी से जीवन भरण करते थे। करीब चार बीघे की अर्द्ध सींचित भूमि, और गाँव के सभी घरों से सीधा (अनाज) मिलाकर, कोई कमी नहीं थी। कान्यकुब्ज ब्राह्मण होने का गर्व, उनके उन्नत भाल -कपाल और गौर वर्ण कुलीन होने का संकेत देते थे। ज्यादा पढ़े तो न थे पर मंत्र और कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि कंठस्थ थी।
लोचन इसके उलट कल किसने देखा है, वाली निश्चिंतता के साथ आज में ही जीते थे। रसड़ा के प्राइमेरी स्कूल में जाने के रास्ते में, अपने मित्रों के साथ सरजू नदी की रेत में बैठ कर तरबूजे खरबूजे खाते। मन किया तो उढ़ा भी कूद लिया। कभी पछिमा ताल पर जाकर पंडुक चिरई देखते थे । यादव मित्रों की संगत में पुरबिया तान में बिरहा, रामायण, आल्हा गाना सीख रहे थे। राजपूत मित्रों के साथ कुस्ती, मलखंब और अन्य करतब सीख रहे थे। ब्राह्मण होने के कारण, उनके सहपाठी उनपर कभी हाथ नहीं उठाते थे। उन्हें प्यार से लोचन बाबा कहते थे। लऊर लाठी भाँजने में माहिर लोचन का शरीर गठीला होता जा रहा था। "विद्या ददाति विनयं" का मंत्र तो तब काम करता जब विद्यालय जाते। किसी तरह पढ़ना लिखना सीख कर उन्होंने इति कर ली।
1912 आते आते उनका शुमार नवहों में होने लगा था। कैलाश मिश्र अपने ज्येष्ठ पुत्र के लक्षण देख कर चिंतित रहने लगे थे। भरसक कोशिश करके अपने छोटे पुत्र फुलेश्वर मिश्र को ननिहाल भेजकर उनकी पढ़ाई लिखाई सुनिश्चित कर लिए।
उन दिनों या संभवतः आज भी, माँ बाप जब समझा कर थक जाते हैं, तो पुत्र के विवाह की ओर सोचने लगते है - हो सकता है, जिम्मेदारी का बोझ इसे रास्ते पर ले आए। रसड़ा के पास बलिया जिला अवस्थित रामपुर में कुलीन ब्राह्मण परिवार में रिश्ता तय हो गया।
स्त्री सुबोधिनी पुस्तक के साथ, चार कहार की डोली पर सवार राज दुलारी का आगमन हुआ। मिश्र परिवार में अजोरिया फैल गई। मुँह देखाई की रस्म के बाद पूरे गाँव में चर्चा रही - कैलाश मिश्र की बहु की। जितना सुंदर चेहरा उतना ही सुंदर कंठ। बहुत ज्यादा तो नहीं पर, छठी कक्षा तक पढ़ी थी। शाम को दिया बाती के बाद रामायण पाठ सुनने के लिए किसी बहाने से कैलाश मिश्र ओसारे में आकार सांस रोके, आँख मूँदे बैठ कर झूमते रहते। सासु माँ बलैया लेती न थकती थीं।
लोचन बात बिना बात इधर उधर पूरे घर में डोलते रहते थे। भाभी के आने के बाद फुलेसर भी ननिहाल से लौट आए थे। अब जब भौजी खुद पढ़ा सकती थी तो यहाँ वहाँ भटकने का क्या काम।
"सांची कहे तोहर आवन से, हमरे अंगना में आइल बहार, हे भौजी"
ई अजोरिया अब चारों ओर फईले के चाहीं। बहुत सुंदर सिलसिला शुरु भईल बा, एकरा के जारी रखल जाव 🙏🌷😊
जवाब देंहटाएंउत्साहित हूं। आपका सहयोग और प्रोत्साहन अपेक्षित है
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