कौन जाने, मौका मिलेगा , या नहीं ..

निःशब्द, निश्चल पड़ी उसकी काया,

प्राण अभी बाकी थे।

अस्पताल से घर लौट भी सकता था,
या जीवन मुक्त भी हो सकता था।

मन भाग रहा था।
स्मृति डोर पर..
एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी
याद ही याद ..

दौड़ भाग के बाद, मन वकील बन बैठा
क्या खोया, क्या पाया
क्या कर सकता था, क्या किया..

एक और आरोप,

उस दिन टहलते हुए उसने भी तो एक अदालत लगाई थी।
बच्चों की मनमानियों को बिन्दु की तरबीयत में कोताही पर मढ़ दिया था।

सुबह दोनों पति पत्नी टहलने निकले थे।
लौटते हुए एटीएम से पैसे निकालने थे।
रास्ते भर वह झिकता रहा था।
बिन्दु सुनती रही ।
अपनी धुन में जब वह आगे जाने लगा,
तो, बिन्दु ने टोका - एटीएम तो पीछे छूट गया।
तीखी नजरों से बिन्दु को देख वह झिड़क पड़ा ,
"बच्चे तो संभलते नहीं हैं, बाकी सब जानती हो।"

तीर सीधा कलेजे पर लगा
बिन्दु बिंध गई।
आँखों में आँसू भर, एक नजर उसने उसे देखा
और, पलट कर घर लौट गई

एटीएम से रुपये निकाल कर थोड़ी देर से वह घर आया।
उसकी चाय बिस्किट और दवाइयाँ टेबल पर रखे थे।
बिन्दु के हाथ में चाय का प्याला तो था,
पर आंखे सूनी थी। उदास खामोश..

सुबह ऑफिस जल्दी जाना था, सो चला गया।

अब सोच रहा है, अगर अस्पताल से घर गया
तो बिन्दु से जरूर माफी मांगेगा।

कौन जाने, मौका मिलेगा भी या नहीं।




टिप्पणियाँ

  1. Very True Sir!

    Life doesn't always give a second chance to all of us & sometimes we are left with nothing but only regrets that why we didn't do the thing which we should have done at that moment.

    Many a times it happens that though we want to express our feelings but resist to do so mainly due to our ego or some other reasons and till the time we prepare ourselves to correct our mistakes & speak our heart out, it becomes too late.

    The story which you have portrayed here in a very concise & impactful way has a great lesson for all of us to learn from it.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही मार्मिक । हम सब के रोज़ की जिंदगी ।वास्तविकता के एकदम करीब। दिल को छू गया। किसी के जाने के बाद हम उसके खालीपन महसूस करते है।
    शानदार प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं

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