माँ, तुम लौट आई

 

संसार से परिचय तुमने कराया

बड़ा हुआ तो संसार ही लील गया मुझे,

जीवन की आपाधापी में ऐसा खोया

जैसे सब कुछ मेरे कंधे पर ही था,

तुम्हारा हाल चाल जानने की फुरसत रही

तुम्हारे सवाल – कैसे हो, खाना खाया क्या?

मेरी तेज रफ्तार में विघ्न ही तो थे

जबाब की औपचारिकता ही निभाता था,

समझ तो, तुम जाती थी।

कहती थी, रखती हूँ, फिर फोन करूंगी

तुम्हारा फोन काटना, सुखद अहसास लगता था।  

 

संसार तो संसार है,

किसका हुआ है

मुँह के बल गिरा मैं,

अदालत में अपनी बारी का इंतजार,

तुम्हारी याद लौटा लाया।  

 

तुम्हारी बढ़ती उमर

तुम्हारे जाने का अहसास,

मेरे संबल को तोड़ता था

एक दिन मैं तुम्हारे सामने फफक ही पड़ा,

बच्चा ही तो था, रो पड़ा,

गर्मी की उस रात

तुमने अंक से सटा, सर पर हाथ फेरा था,

तुमने कहा था

मत घबराओ, मैं कहीं नहीं जा रही

जब तक तुम्हारा मुकदमा निपटे मैं नहीं जाती,

 

मुझे तुम्हारी प्रतिज्ञा पर हंसी आई

कितनी भोली हो, ममता में भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली

मुकदमे तो पीढ़ियों चलते है।

 

चमत्कार

फैसला मेरे पक्ष में हुआ।

खुशी में भी मुझे अहसास था

ईश्वर से मांगी तुम्हारी मोहलत  के खत्म होने का

 

अगली  गर्मियों में तुम चल दी

रोया तो बहुत

पर , आंसुओं का क्या, सूख ही जाते हैं।

 

अगली सर्दियों में

नव प्रसूत अपनी पोती  को देखने अस्पताल गया

उसकी मुस्कान में तुम्हारी झलक थी

एक टक  उसने मुझे देखा

और मुस्कुरा दी

जैसे तुम मुसकुराती थी

मैं अब आश्वस्त हूँ

तुम लौट आई हो..



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