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Spence's Hotel - (Calcutta 1931)

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Present day the Income Tax Office and CAG office housed in the erstwhile Treasury Building, is situated at the place, where stood, First Luxury Hotel of Asia that, is Spence's Hotel.    It was inaugurated in 1831. It was 74 suite rooms hotel to cater business travelers. It boasted advanced facilities like flush toilet, room service (Bell attached with string to call butler).   This hotel was popular with Indian Maharajas as well.    The land on which Spence’s Hotel stood, was acquired by the Government in the 1880’s, and Spence’s was relocated to Wellesley Place (renamed Red Cross Place), from where it continued to operate, until it was eventually demolished unceremoniously.   After acquisition of the said property, a massive and magnificent building was constructed on the said plot of land between 1882 and 1884, during the tenure of Lord Ripon as the Governor General of the British India.    The red brick structure of the Treasury building, ...

Chinese Food - as it arrived in India

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  Earlier Chinese migrants to India (1778) were Cantonese, who specialized in carpentry. As they made Kolkata as their home, they flourished in the business of Tea, Porcelain, and Chinese Silk. Kolkata was the hub, from where merchandise moved to England and Portugal. By 1850, Hakka Chinese from Central China arrived in Kolkata. They settled in Boubazar and Moulali. Hakka and Cantonese though both from China did not see each other eye to eye. With history of conflict in mainland China, the same was repeated here at Kolkata. Hakka Chinese could not compete with Cantonese. So, they started the business of Home cooked Chinese food (noodles). First Chinese food outlet was opened in the same building where "Tung Nam" restaurant (Tiretti) is housed at present. Chinese food was outright success. It tinkled the Indian Test Buds. Cantonese saw the opportunity in the business, by being suppliers of condiments for Chinese food. They supplied sauces for Chinese food. Soon, the cuisine wa...

साथ चले

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  साथ चलें साथ ही साथ चले साथ ही साथ रहे, रहे भी पर रहे नहीं   मैं अपनी नौकरी में और तुम बच्चों में इतने मशगूल हुए हम, कि बातें ही चूक गईं   सब उड़ चले, अपने आशियाने, घोंसला हुआ वीरान,   अब तो चलें हम भी साथ साथ, अपने गगन की तलाश में, आसमान में तारे गिनें, सुबह सवेरे कलरव सुने। साथ साथ रहें, साथ साथ जिएं सँजो लें यादें, फिर मिलने के वादे के साथ,,,    

घोरघट की चीखें

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  भूत होते हैं क्या? या, कुछ पल ठहर जाते हैं, काल खंड में विलीन होने से बच जाते हैं। जैसे राख के नीचे सुलगते बोरसी के अंगारे। अगर किसी ने उन्हे खोर दिया, तो अंगारे भभक पड़ते हैं। चलें, छोड़ें, कहाँ की कहाँ ले बैठा। बचपन में शहर से ननिहाल गाँव जाने में एक उत्साह नदी में नहाने का भी रहता था। कहते हैं, भगवान राम ने, वन जाते समय अपनी पहली रात, अयोध्या वासियों के साथ इसी तमसा नदी के तट पर बिताई थी। अंग्रेजों ने इसका नाम “टोंस” रख दिया। गाँव के मुहाने पर, प्रवेश करने से पहले, यह नदी समकोण पर दायें घूम जाती है। निरंतर प्रवाह ने उस जगह की माटी बहा कर खोह बना दिया था। वहाँ की गहराई बहुत ज्यादा है। बरसात के बाद, नदी जब पूरे शबाब पर होती, उसमें भँवर भी पड़ते हैं । पुराने लोग बताते हैं, जलधार, मँझधार, भँवर के साथ वेगवती नदी उनदिनों, बड़े अनुभवी नाविकों को भी चुनौती देती थी। बरसात तो छोड़ दें, अन्य दिनों में भी, जब हम सभी बच्चा पार्टी, नदी में नहाने जाती थी, तो उम्रदराज बच्चों पर जिम्मेदारी होती थी – घोरघट की तरफ नहीं जाना है। जबतक हम बच्चे थे, बड़ों का कहा मान लेते थे। जब हम खुद ही खुद को ...

बंदर तो बंदर है।।।

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  ध्यान से देखें विवाह के आयोजन को जब एक बंदर धूम धाम से बनता है दूल्हा वहीं कुर्सियों पर बैठी महिलायें नजर रखती हैं अपने बंदरों पर बंदर अगर सफल हो, शिष्ट हो आदेश परस्त हो तो जीवन सफल मुस्कान ही मुस्कान अन्यथा कुढ़न ही कुढ़न दूसरी तरफ हुए बंदर सभी आजाद, सीमाओं को तोड़, मारी एक छलांग जैसे आज नहीं तो कभी नहीं ड्रिंक्स काउन्टर की तरफ भागे सभी, परहेजी बंदर भागे स्वीट काउन्टर पर दबाने रसगुल्ले और हलवा गाजर का, नादान हैं सब नहीं जानते, उनपर नजर का पहरा है। राज बड़ा गहरा है। बात करते करते भी महिलायें गिन लेती हैं पेग जो उनके बंदर ने डकारे हैं गिन लेती हैं मिठाईयां जो परहेजियों ने दबाई हैं गिन लेती हैं गुलाटियाँ जो उनके बंदरों ने मारी हैं अकेले मिलें तो हिसाब हो बंदर से आदमी बनाने की कवायद हो। कहते हैं, बुड्ढा बंदर कभी गुलाटी नहीं भूलता उम्र बीत जाती है, पत्नी की अपने बंदर को साधते साधते। जानती तो है कितना भी उलटे कितना भी घुलटे जाएगा कहाँ ? आएगा, उसका बंदर उसी के पास।

राज ज्योतिषी -३ (अंतिम भाग)

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गंगा घाट पर आरती हो चुकी थी। गंगा शांत लहरों में  बह रही थी, जैसे वाराणसी से आगे  गंगा सागर तक की यात्रा की तैयारी कर चुकी हो। संध्या अब रात्रि में परिवर्तित हो रही थी। चंद्र किरणे गंगा की लहरों पर अठखेलियाँ कर रहीं थी। घाट की भीड़ कम हो चली थी।  आचार्य महेंद्र मिश्र गंगा घाट के तट पर अवस्थित हवेली के दालान में अपने आसन पर बैठ रामायण पढ़ रहे थे। उनकी दिनचर्या रामायण से ही समाप्त होती थी।  आज एक चौपाई जैसे मन में ही अटक गई -  "सुनहु भरत भावी प्रबल , बिलख कहेउ  मुनिहु   नाथ हानि लाभ जीवन मरण ,यश अपयश विधि हाथ।" भावी और भवितव्य से उनका भी तो कभी पाला पड़ा था।   विश्व विद्यालय से शास्त्री की परीक्षा पास करने के बाद, महेंद्र मिश्र, संकट मोचन  मंदिर के मुख्य पुरोहित के शिष्यत्व  में  ज्योतिष विद्या का व्यवहारिक  ज्ञान अर्जित करने में लग गए।  सहूलियत के हिसाब से, उन्हें एक ठौर मिली गंगा किनारे एक पुरानी हवेली में। महेंद्र मिश्र , गांगुली  महाशय  के किरायेदार हुए। वृद्धावस्था में सहारे के लिए गांगुली महोदय की...

राज ज्योतिषी - भाग -2

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वसंत पंचमी की सुबह, महेंद्र मिश्र की वेद पाठशाला में चहल पहल थी। आज से नए वेद पाठी छात्र, माता सरस्वती की उपासना कर वेद पाठ के  प्रथम सत्र का शुभारंभ करने वाले थे।  अभिभावकों के साथ आए सद्यः स्नात, नवीन वेषधारी वेदपाठी प्रशिक्षु बालक सहमें बैठे हुए थे। वहीं पुराने छात्र, पीत आवरण व धोती पहन इधर से उधर व्यस्त से डोल रहे थे। उनकी एक आँख, नव छात्रों पर भी लगी थी। जब भी नव-छात्र बाल सुलभ कलरव शुरू करते, पूर्ववर्ती छात्र आँखे तरेर कर अनुशासन स्थापित करते।  पंडित महेंद्र मिश्र नें तैयार हो, तिलक लगाते हुए, एक बार खिड़की से आँगन में झांक लिया। आँगन में सरस्वती प्रतिमा के आस पास का कोलाहल, उन्हें अनायास ही अपने बाल्य काल में लेकर चल पड़ा। जब, "वीणा वादिनी  वर दे..." का उनका  सस्वर पाठ सुधि जनों का ध्यान आकृष्ट करता था।  स्मृतियाँ उन्हे लेकर उनके गाँव पहुँच गईं, उस वसंत पंचमी को उनके पिता कैलाश मिश्र उन्हे माता सरस्वती की महिमा समझा रहे थे।  कैलाश मिश्र की आजीविका, पुरोहिताई से चलती थी। गाँव के मंदिर की पूजा का भी भार उनके उपर ही था।  यजमान के घर कथा बाँचने ...