कुछ पल यूं ही..
कहते हैं, दिमाग हर दिन लिखता मिटाता रहता है। पुरानी स्मृतियों को धुंधला करता, नई स्मृतियों को सँजोता, दिन प्रतिदिन कहानियाँ बुनता है। कुछ पल अमिट होते हैं। आज प्रौढ़ावस्था में सोच कर आश्चर्य होता है, कुछ छोटी बातें, जिनका कोई संदर्भ न हो, उनको कैसे और क्यों मन सँजो लेता है। सोचता हूँ, आज भी, मुझे अपनी लोअर किन्डर्गार्टन से क्लास ६ तक की पढ़ाई के लम्हे याद क्यों है। गोपा मैडम, मेरी मैडम ( मेरी क्लास टीचर) का परफ्यूम आज भी पहचान सकता हूँ। देश विदेश के किसी शॉपिंग माल में जाते हुए, आज भी उस परफ्यूम की गंध मुझे खीच कर पटना के अपने पुराने स्कूल में सन १९६९ में छोड़ आती है। बहरहाल, मैं जिस वाकये को दर्ज करना चाहता हूँ, वह क्लास ६ का है। मंजु मैडम साइंस पढ़ाती थीं। उनका पढ़ाने का तरीका अलग था। साइंस जैसे नीरस विषय में उदाहरणों से जान डाल देती थीं। उनके वार्डरोब में संभवतः सफेद या हल्के रंग की साड़ियाँ ज्यादा थीं। उनकी हल्की सावले रंग की हल्की मुसकुराती छवि और गहरी आंखे याद है। मुझे याद पड़ता है, उन दिनों हम आपस में मैडम लोगों के कपड़े, पर्स और पर्सनैलिटी के बारे में ज्यादा बात करते थ...