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घोरघट की चीखें

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  भूत होते हैं क्या? या, कुछ पल ठहर जाते हैं, काल खंड में विलीन होने से बच जाते हैं। जैसे राख के नीचे सुलगते बोरसी के अंगारे। अगर किसी ने उन्हे खोर दिया, तो अंगारे भभक पड़ते हैं। चलें, छोड़ें, कहाँ की कहाँ ले बैठा। बचपन में शहर से ननिहाल गाँव जाने में एक उत्साह नदी में नहाने का भी रहता था। कहते हैं, भगवान राम ने, वन जाते समय अपनी पहली रात, अयोध्या वासियों के साथ इसी तमसा नदी के तट पर बिताई थी। अंग्रेजों ने इसका नाम “टोंस” रख दिया। गाँव के मुहाने पर, प्रवेश करने से पहले, यह नदी समकोण पर दायें घूम जाती है। निरंतर प्रवाह ने उस जगह की माटी बहा कर खोह बना दिया था। वहाँ की गहराई बहुत ज्यादा है। बरसात के बाद, नदी जब पूरे शबाब पर होती, उसमें भँवर भी पड़ते हैं । पुराने लोग बताते हैं, जलधार, मँझधार, भँवर के साथ वेगवती नदी उनदिनों, बड़े अनुभवी नाविकों को भी चुनौती देती थी। बरसात तो छोड़ दें, अन्य दिनों में भी, जब हम सभी बच्चा पार्टी, नदी में नहाने जाती थी, तो उम्रदराज बच्चों पर जिम्मेदारी होती थी – घोरघट की तरफ नहीं जाना है। जबतक हम बच्चे थे, बड़ों का कहा मान लेते थे। जब हम खुद ही खुद को ...

बंदर तो बंदर है।।।

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  ध्यान से देखें विवाह के आयोजन को जब एक बंदर धूम धाम से बनता है दूल्हा वहीं कुर्सियों पर बैठी महिलायें नजर रखती हैं अपने बंदरों पर बंदर अगर सफल हो, शिष्ट हो आदेश परस्त हो तो जीवन सफल मुस्कान ही मुस्कान अन्यथा कुढ़न ही कुढ़न दूसरी तरफ हुए बंदर सभी आजाद, सीमाओं को तोड़, मारी एक छलांग जैसे आज नहीं तो कभी नहीं ड्रिंक्स काउन्टर की तरफ भागे सभी, परहेजी बंदर भागे स्वीट काउन्टर पर दबाने रसगुल्ले और हलवा गाजर का, नादान हैं सब नहीं जानते, उनपर नजर का पहरा है। राज बड़ा गहरा है। बात करते करते भी महिलायें गिन लेती हैं पेग जो उनके बंदर ने डकारे हैं गिन लेती हैं मिठाईयां जो परहेजियों ने दबाई हैं गिन लेती हैं गुलाटियाँ जो उनके बंदरों ने मारी हैं अकेले मिलें तो हिसाब हो बंदर से आदमी बनाने की कवायद हो। कहते हैं, बुड्ढा बंदर कभी गुलाटी नहीं भूलता उम्र बीत जाती है, पत्नी की अपने बंदर को साधते साधते। जानती तो है कितना भी उलटे कितना भी घुलटे जाएगा कहाँ ? आएगा, उसका बंदर उसी के पास।

राज ज्योतिषी -३ (अंतिम भाग)

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गंगा घाट पर आरती हो चुकी थी। गंगा शांत लहरों में  बह रही थी, जैसे वाराणसी से आगे  गंगा सागर तक की यात्रा की तैयारी कर चुकी हो। संध्या अब रात्रि में परिवर्तित हो रही थी। चंद्र किरणे गंगा की लहरों पर अठखेलियाँ कर रहीं थी। घाट की भीड़ कम हो चली थी।  आचार्य महेंद्र मिश्र गंगा घाट के तट पर अवस्थित हवेली के दालान में अपने आसन पर बैठ रामायण पढ़ रहे थे। उनकी दिनचर्या रामायण से ही समाप्त होती थी।  आज एक चौपाई जैसे मन में ही अटक गई -  "सुनहु भरत भावी प्रबल , बिलख कहेउ  मुनिहु   नाथ हानि लाभ जीवन मरण ,यश अपयश विधि हाथ।" भावी और भवितव्य से उनका भी तो कभी पाला पड़ा था।   विश्व विद्यालय से शास्त्री की परीक्षा पास करने के बाद, महेंद्र मिश्र, संकट मोचन  मंदिर के मुख्य पुरोहित के शिष्यत्व  में  ज्योतिष विद्या का व्यवहारिक  ज्ञान अर्जित करने में लग गए।  सहूलियत के हिसाब से, उन्हें एक ठौर मिली गंगा किनारे एक पुरानी हवेली में। महेंद्र मिश्र , गांगुली  महाशय  के किरायेदार हुए। वृद्धावस्था में सहारे के लिए गांगुली महोदय की...

राज ज्योतिषी - भाग -2

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वसंत पंचमी की सुबह, महेंद्र मिश्र की वेद पाठशाला में चहल पहल थी। आज से नए वेद पाठी छात्र, माता सरस्वती की उपासना कर वेद पाठ के  प्रथम सत्र का शुभारंभ करने वाले थे।  अभिभावकों के साथ आए सद्यः स्नात, नवीन वेषधारी वेदपाठी प्रशिक्षु बालक सहमें बैठे हुए थे। वहीं पुराने छात्र, पीत आवरण व धोती पहन इधर से उधर व्यस्त से डोल रहे थे। उनकी एक आँख, नव छात्रों पर भी लगी थी। जब भी नव-छात्र बाल सुलभ कलरव शुरू करते, पूर्ववर्ती छात्र आँखे तरेर कर अनुशासन स्थापित करते।  पंडित महेंद्र मिश्र नें तैयार हो, तिलक लगाते हुए, एक बार खिड़की से आँगन में झांक लिया। आँगन में सरस्वती प्रतिमा के आस पास का कोलाहल, उन्हें अनायास ही अपने बाल्य काल में लेकर चल पड़ा। जब, "वीणा वादिनी  वर दे..." का उनका  सस्वर पाठ सुधि जनों का ध्यान आकृष्ट करता था।  स्मृतियाँ उन्हे लेकर उनके गाँव पहुँच गईं, उस वसंत पंचमी को उनके पिता कैलाश मिश्र उन्हे माता सरस्वती की महिमा समझा रहे थे।  कैलाश मिश्र की आजीविका, पुरोहिताई से चलती थी। गाँव के मंदिर की पूजा का भी भार उनके उपर ही था।  यजमान के घर कथा बाँचने ...

राज ज्योतिषी (1)

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  वसंत पंचमी की सुबह गंगा घाट पर थोड़ी भीड़ तो थी , पर , पंडित महेंद्र मिश्र को स्नान करने में कोई दिक्कत न हुई।   सभी जानते थे , सुबह सूरज उगना भूल जाए पर नियत समय पर ठीक 5 बजे , मिश्र जी जरूर नहायेंगे। नहाते समय  ठोस आवाज में  जब पंडितजी  स्नान मंत्र पढ़ते , तो लगता साक्षात शंभू के दर्शन हुए।   नहाने के बाद बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ा कर ही मिश्र जी की दिनचर्या प्रारंभ होती थी ।   अगला कदम उदय चौरसिया की दुकान से चाय की दो प्याली के बाद पान खा कर ही उठता था।   उदय से उनकी जान पहचान बहुत पुरानी थी। कचोड़ी गली के नुक्कड़ पर जब मिश्र जी विद्यार्थी के तौर पर आए थे , तब , से। उदय तब 10 साल का रहा होगा।   एक उदय ही था जो मिश्र जी से थोड़ी ठिठोली कर सकता था।   उस दिन दुकान पर आते ही उसने तुक्का छोड़ा, यह जानते हुए भी कि, बाबा हाथ देखने से नफरत करते हैं ,और, वर्षों से सीखी  ज्योतिष विद्या कबके त्याग चुके हैं।     “का बाबा , बहुत जबरदस्त लागत हौआ , हमार हाथ देख के बताव त , कब तक शनि तबाह करी। साढ़े साती खतमे नई...

माँ, तुम लौट आई

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  संसार से परिचय तुमने कराया बड़ा हुआ तो संसार ही लील गया मुझे, जीवन की आपाधापी में ऐसा खोया जैसे सब कुछ मेरे कंधे पर ही था, तुम्हारा हाल चाल जानने की फुरसत न रही तुम्हारे सवाल – कैसे हो, खाना खाया क्या? मेरी तेज रफ्तार में विघ्न ही तो थे जबाब की औपचारिकता ही निभाता था, समझ तो, तुम जाती थी। कहती थी, रखती हूँ, फिर फोन करूंगी तुम्हारा फोन काटना, सुखद अहसास लगता था।     संसार तो संसार है, किसका हुआ है मुँह के बल गिरा मैं, अदालत में अपनी बारी का इंतजार, तुम्हारी याद लौटा लाया।     तुम्हारी बढ़ती उमर तुम्हारे जाने का अहसास, मेरे संबल को तोड़ता था एक दिन मैं तुम्हारे सामने फफक ही पड़ा, बच्चा ही तो था, रो पड़ा, गर्मी की उस रात तुमने अंक से सटा, सर पर हाथ फेरा था, तुमने कहा था मत घबराओ , मैं कहीं नहीं जा रही जब तक तुम्हारा मुकदमा न निपटे मैं नहीं जाती,   मुझे तुम्हारी प्रतिज्ञा पर हंसी आई कितनी भोली हो , ममता में भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली मुकदमे तो पीढ़ियों ...

भाई सहोदर कभी न मिलिहैं , चाहे कोटी करो उपाय

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उम्र के उस पड़ाव पर, जब देखने को कुछ ज्यादा बचा न हो, तो मन पीछे भाग कर स्मृतियाँ जुटाता है। इसी तरह की एक डुबकी, मुझे आल्हा उदल की गाथा में ले गई।  एक डुबकी, एक न रही, मन ही दरिया हो गया।  मैं बह चला।  यू  ट्यूब  में आल्हा सुनता रहा। आल्हा उदल की कहानी तो पता थी। लेकिन, एक प्रसंग ऐसा मिला, जो आज की हिसाबी किताबी पीढ़ी से कहीं आगे है।  आगे बढ़ने से पहले एक प्रसंग परिचय का:  जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं. मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन 1250 में लिखा गाया था .  भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही..... लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. मतलब ये कि वह गाथा जिसे गा कर सुनाया जाये लोकगाथा कहलाती है. "रन में दपक -दप बोले तलवार, पनपन-पनपन तीर बो...